|
| |
ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें
ऐसी,
कि हर ख़्वाहिश प'
दम निकले,
बहुत
निकले मेरे
अरमान,
लेकिन फिर
भी कम निकले.
डरे क्यूं मेरा क़ातिल?
क्या रहेगा उसकी
गर्दन
पर,
वो ख़ूं,
जो
चश्म-ए-तर से उम्र भर यूं दम-बदम निकले!
निकलना ख़ुलद से आदम का
सुनते आए थे लेकिन,
बहुत
बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले.
भरम खुल जाए,
ज़ालिम! तेरे क़ामत
की दराज़ी का,
अगर उस
तुर्र:-ए-पुर्पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले.
मगर
लिखवाए कोई उसको ख़त,
तो हमसे लिखवाए,
हुई सुबह,
और घर से
कान पर रखकर क़लम
निकले.
हुई इस दौर में मंसूब मुझसे बाद:
आशामी,
फिर आया
वो ज़माना:,जो
जहां में
जाम-ए-जम निकले.
हुई जिनसे तवक़्क़ो,
ख़स्तगी की दाद
पाने की,
वो हमसे
भी ज़ियाद:
ख़स्त:-ए-तेग़-ए-सितम निकले.
मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़,
जीने और मरने का,
उसी को
देखकर जीते
हैं,
जिस काफ़िर प'
दम निकले.
कहां मैख़ाने का दरवाज़: 'ग़ालिब'
और कहां
वाइज़,
पर इतना
जानते हैं,
कल वो जाता था कि
हम निकले.
|