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भागवद गीता प्रस्तावना सर्वविदित है कि गीता पर २००० से अधिक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं जिनमें अनेक अनुवाद, टीका, व्याख्या आदि सम्मिलित हैं. बहुत सी पुस्तकें हिन्दी भाषा में भी लिखी गई हैं, फिर गीता पर एक और पुस्तक हिन्दी में लिखने का क्या उद्देश्य है? हिन्दी भाषा में लिखि पुस्तकों में आम तौर से दो कमियां महसूस की जाती हैं, एक तो उनकी हिन्दी भाषा इतनी कठिन होती है कि सब लोगों की समझ में नहीं आती. दूसरे, अधिकतर ये पुस्तकें गद्य के रूप में लिखी गई हैं जिनको पढ़ा जा सकता है लेकिन गाया नहीं जा सकता. संस्क्रित की मूल गीता पद्य रूप में है और उसकी लोकप्रियता का यह एक मुख्य कारण माना जाता है. इन दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए यह सुझाव दिया गया कि यदि गीता को साधारण लोगों की समझ में आने वाली हिन्दी भाषा में पद्य रूप में प्रस्तुत किया जाये तो वह और भी रोचक हो सकती है. इस सुझाव से हिन्दी गीता लिखने की प्रेरणा मिली. आम लोगों को हिन्दी में लिखी गीता की पुस्तकों में भाषा की कठिनता के अलावा भावों की जटिलता से भी परेशानी होती है. शाब्दिक अनुवादों में भाव-प्रवाह की कमी होना स्वाभाविक है. इसको ध्यान में रखते हुए हिन्दी गीता में शाब्दिक अनुवाद की अपेक्षा भाव-प्रवाह पर अधिक महत्व दिया गया है. इसी द्रिष्टिकोण से श्री क्रिष्ण और अर्जुन के गीता में जो अनेक नाम प्रयुक्त हुए हैं, उन सबका हिन्दी गीता में उपयोग नहीं किया गया है. जहां तक गीता को गीत रूप में प्रस्तुत करने का प्रश्न है, हिन्दी गीता की यह सबसे प्रमुख विशेषता है. इसके छन्दों को संगीत-बद्ध करके सुगमता से गाया जा सकता है. इससे गीता को याद करने और उसे हिन्दी समझने वालों में और अधिक लोकप्रिय बनाने में सहायता मिलेगी. साप्ताहिक पाठ करने वालों की सुविधा के लिये गीत को अन्त में ५२ पाठों में विभाजित करने का एक नया ढंग प्रस्तुत किया गया है. भागवद गीता का हिन्दी पद्य रूप यूनिकोड में पाठकों के सामने इन्टरनेट पर प्रस्तुत है. आशा है इससे हिन्दी प्रेमियों को भागवद गीता के बहुत से पहलुओं को नये द्रिष्टिकोण से देखने का अवसर मिलेगा.
योगेश्वर ने युद्ध
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