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भागवद गीता अध्याय-०४ ग्यान योग साप्ताहिक पाठ-१२/४.०१ योगेश्वर ने कहा: योग अनश्वर, यह मैंने था, विवस्वान को सिखलाया, विवस्वान ने मनु को, मनु ने इक्षवाकु को बतलाया. ४.०२ योग, राज-रिषियों ने, परम्परागत आपस में सीखा, बहुत काल तक लुप्त हो गया, तब यह योग नहीं दीखा. ४.०३ योग पुराना, जिस के अन्दर परम रहस्य समाया है, तू है मेरा भक्त, सखा भी, तुझ को वह सिखलाया है. ४.०४ अर्जुन ने कहा: विवस्वान जन्मा पहले, वह तुम से पहले आया था, कैसे समझूं तुमने ही यह योग उसे सिखलाया था? ४.०५ योगेश्वर ने कहा: हे अर्जुन! हम दोनों पैदा हुये अनेकों बार यहीं, मैं तो सभी जानता, लेकिन तुझ को कुछ भी ग्यात नहीं. ४.०६ मैं हूं अमर, अजन्मा, सभी प्राणियों का मैं स्वामी हूं, फिर भी होता प्रगट, प्रक्रिति के नियमों का अनुगामी हूं. ४.०७ हे अर्जुन! जब धर्म पतन से व्याकुल यह संसार हुआ, पुन: धर्म को स्थापित करने, तब मेरा अवतार हुआ. ४.०८ रक्षा करने हेतु सज्जनों की, मैं तत्पर रहता हूं, करूं नष्ट दुष्टों को, इस के लिये प्रगट मैं होता हूं. ४.०९ मेरे दिव्य जन्म, कर्मों को, जो भी व्यक्ति जान जाये, जन्म न ले फिर इस जग में, वो मेरे पास चला आये. ४.१० राग, क्रोध, भय से विमुक्त, जो मेरी शरण पहुंचता है, ग्यान, तपस्या द्वारा, हो पवित्र, मुझ में आ मिलता है. ४.११ जैसे भी कोई आये, मैं उसी तरह अपनाता हूं, हे अर्जुन! मैं सब राहों से, अपने पास बुलाता हूं. ४.१२ प्रिथ्वी पर जो अपने कर्मों से फल की इच्छा रखते, बलि देकर वे, देव गणों से, फल को शीघ्र प्राप्त करते. साप्ताहिक पाठ-१३/४.१३ गुण, कर्मों से नियमित, चार वर्ण की रचना की मैंने, किन्तु नहीं मैं बंधा कर्म से, चाह न फल की की मैंने. ४.१४ कर्म मुझे दूषित न करें, फल की मुझ को कामना नहीं, जो यह जाने, उस को कोई कर्म कभी बांधता नहीं. ४.१५ आदि काल में मोक्ष प्राप्ति के लिये सभी ने कर्म किये, उन की तरह कर्म कर तू भी, मोक्ष मिले, बस इसी लिये. ४.१६ देख अकर्म, कर्म का अंतर, ग्यानी भी हैं चकराये, मैं बतलाऊंगा वह जिस से, दोष-मुक्त तू हो जाये. ४.१७ कर्म, अकर्म, विकर्म सभी का, मुझ से तू पायेगा ग्यान, इसे समझ अर्जुन, कर्मों में अंतर होता बड़ा महान. ४.१८ कर्मों में जो अकर्म देखे, अकर्म में देखे जो कर्म, योग-युक्त ग्यानी है, यद्यपि करता है वह सारे कर्म. ४.१९ जिसके सारे कर्म, फलों की इच्छा से स्वतन्त्र रहते, अग्नि परीक्षा करे कर्म की, उसे लोग पंडित कहते. ४.२० कर्म-फलों को त्यागे, त्रप्त रहे, न किसी पर आश्रित हो, उस का आत्मन मुक्त, भले ही सदा कर्म में वह रत हो. ४.२१ अहम और चित जिस के वश में, इच्छा कोई रहे नहीं, त्याग सम्पदाओं को, तन से कर्म करे तो दोष नहीं. ४.२२ सन्तोषी, द्वन्द्व से परे, ईर्ष्या न रहे जिस के मन में, जीत, हार में समान रहता, नहीं कर्म के बन्धन में. ४.२३ जो हो अनासक्त, ग्यान में युक्त, स्थिर मन हो जाये, कर्म करे यग्य की तरह, वह कर्मों से ऊपर जाये. ४.२४ कर्म उसे है ब्रह्म, वस्तु जो अर्पित हो वो भी है ब्रह्म, अनुभव करे ब्रह्म को वह कर्मों में, पा लेता है ब्रह्म. साप्ताहिक पाठ-१४/४.२५ कुछ योगी अपने देवों के लिये यग्य को करते हैं, अन्य, यग्य को ब्रह्म अग्नि में ही अर्पित कर देते हैं. ४.२६ कुछ संयम से श्रवण आदि सब इन्द्रि भस्म कर देते हैं, अन्य इन्द्रियों में उन के विषयों की आहुति देते हैं. ४.२७ कुछ करते अर्पित इन्द्रियों में, प्राण-शक्ति के कर्मों को, आत्म-नियन्त्रण की ज्वाला में, ग्यान जलाता है जिन को. ४.२८ कुछ सम्पति, कुछ तप, कुछ योगाभ्यास समर्पित करते हैं, कुछ मन वश में कर, विद्या या ग्यान समर्पित करते हैं. ४.२९ कुछ श्वासों के द्वारा अपने प्राण नियन्त्रित करते हैं, पान, अपान वायु को उचित मार्ग में अर्पित करते हैं. ४.३० कुछ नियमित भोजन की, अपने प्राणों में आहुति देते, वे हैं ग्यानी यग्यों के, उन के सब पाप नष्ट होते. ४.३१ प्राप्त करें वो ब्रह्म सनातन, बचा यग्य का जो खायें, यग्य बिना तो लोक और परलोक नहीं कुछ भी पायें. ४.३२ जग में यग्य बहुत से, जिन की राह ब्रह्म के मुख तक जान, वे सब पैदा हुये कर्म से, मुक्ति दिलायेगा यह ग्यान. साप्ताहिक पाठ-१५/४.३३ ग्यानमयी यग्यों को भौतिक यग्यों से उत्तम पाते, सभी कर्म, अंत में, ग्यान में मिल कर विलीन हो जाते. ४.३४ आदर, विनय, प्रश्न, सेवा के द्वारा प्राप्त करो वह ग्यान, ग्यानी, बड़ा दार्शनिक ही बतलायेगा यह ऊंचा ग्यान. ४.३५ कभी भ्रान्ति में नहीं पड़े, यह ग्यान अगर तू पा जाये, सब सत्ता पाये आत्मन में, तब मेरे अन्दर पाये. ४.३६ पापी कैसा भी तू होवे, अन्य पापियों से बढ़कर, पहुंचेगा उस पार, ग्यान की नैया के ऊपर चढ़कर. ४.३७ जैसे अग्नि जलाकर सब ईंधन को राख बनाती है, अग्नि ग्यान की, वैसे ही, कर्मों को ख़ाक़ बनाती है. ४.३८ प्रिथ्वी पर ग्यान के बराबर कोई और न पवित्रता, पाये जो पूर्णता योग से, उस को ग्यान आप मिलता. ४.३९ श्रद्धावान, जीत इन्द्रियों को, ग्यान प्राप्त कर लेता है, ग्यान प्राप्त कर शीघ्र, शान्ति सर्वोच्च प्राप्त कर लेता है. ४.४० जो अग्यानी, श्रद्धाहीन, शकी, वह हो जाता है नष्ट, लोक और पर्लोक सब जगह, वह केवल पाता है कष्ट, ४.४१ संशय को ग्यान से मिटा, जिस ने कर्मों का त्याग किया, योग-लीन हो, आत्म-नियन्त्रण कर, अपने को मुक्त किया. ४.४२ अपने मन के संदेहों पर, चला ग्यान रूपी तलवार, ग्यान-योग से, हे अर्जुन! हो जायेगा उन का संहार. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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