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भागवद गीता अध्याय-०५ कर्म सन्यास योग साप्ताहिक पाठ-१६/५.०१ अर्जुन ने कहा: कभी प्रशंसा कर्म त्याग की, कर्म योग की कभी करो, योगेश्वर, बतलाओ, इन में कौन उचित है? किसे करो? ५.०२ योगेश्वर ने कहा: कर्म त्याग या कर्म योग, दोनों ही मुक्ति दिलाते हैं, कर्म योग लेकिन उत्तम, ऐसा ग्यानी बतलाते हैं. ५.०३ सन्यासी है वही, कामना और द्वेष से मुक्त रहे, होकर मुक्त सभी द्वन्द्वों से, बन्धन से भी मुक्त रहे. ५.०४ अंतर सांख्य व कर्म योग में, अग्यानी बतलाते हैं, किसी एक पर चलने वाले, दोनों का फल पाते हैं. ५.०५ सांख्य योग से जो फल पाते, कर्म योग से भी पाते, सही ग्यान उन को, जो एक मार्ग दोनों को बतलाते. ५.०६ हे अर्जुन! यह बहुत कठिन है, बिना योग सन्यास मिले, जो निष्ठा से लगे योग में, ब्रह्म उसी को यहां मिले. ५.०७ योग युक्त, मन निर्मल, आत्म नियन्त्रित, जीते इन्द्रियों को, सब में अपनी आत्मा देखे, पार करे वह कर्मों को. ५.०८ होकर लीन ब्रह्म में जो जानता, तत्व हैं क्या गहरे, सब इन्द्रियों से कर्म करे, पर जाने उस ने कुछ न करे. ५.०९ छूते, खाते, आंख खोलते, सांस छोड़ते या लेते, समझे केवल इन्द्रियों से ही, सारे विषय लगे होते. ५.१० निरासक्त हो, अर्पित करे ब्रह्म को अपने कर्म सभी, जैसे जल न लगे पंकज को, पाप उसे ना लगे कभी. ५.११ योगी कर्म करे बिन चाहत, करने पवित्र आत्मन को, तन, चित, बुद्धि, इन्द्रियों द्वारा, सदा कराये कर्मों को. ५.१२ कर्म-फलों को त्याग, योग में लीन, शान्ति को पाता है, रखे कामना कर्म-फलों की, बन्धन में पड़ जाता है. ५.१३ त्याग कर्म-फल, मन को जीते, आत्मन कुछ न कराता है, नौ द्वारों के श्रेष्ठ धाम में, आराम सुखद पाता है. ५.१४ परमात्मा न कराये कर्म, कर्म-फल से वह अलग रहे, प्राणी स्वभाव के कारण ही, कर्म-फलों में लगा रहे. ५.१५ ईश्वर अनासक्त दोनों से, पाप न ले वो पुन्य न ले, ढक दे जब अग्यान ग्यान को, सम्मोहित हो मन डोले. साप्ताहिक पाठ-१७/५.१६ ग्यान प्राप्त कर कोई जब अग्यान नष्ट कर देता है, उस के मन को ग्यान, सूर्य की तरह प्रकाशित करता है. ५.१७ भक्ति, विचार, चेतना द्वारा, जो पर्मात्मा पा जाते, वापिस नहीं लौटते, उन के पाप ग्यान से धुल जाते. ५.१८ विनयशील विद्या से जब पक जाता है पंडित का ग्यान, ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ता, चांडाल दीखते एक समान. ५.१९ साम्य अवस्था पाकर जब प्रिथ्वी पर सब को जीत लिया, परमात्मा निर्दोष, साम्य है, उस का ही अनुकरण किया. ५.२० सुखी न हो अच्छी चीज़ों से, बुरी चीज़ से दुखी न हो, अटल-बुद्धि, मोह-रहित, ग्यानी, उसे ब्रह्म में लीन कहो. ५.२१ पाता आत्मानन्द वही, जो बाह्य विषय से रहे परे, जो है लीन ब्रह्म में, वह अनुपम सुख का उपभोग करे. ५.२२ इन्द्रि-भोग से मिलते जो सुख, जन्म दुखों को हैं देते, उन का है आरम्भ, अंत भी, ग्यानी उन्हें नहीं लेते. ५.२३ काम, क्रोध दोनों को रोके, जो करने से पहले ही, वह नर है सच्चा योगी, सुख से रहता है यहां वही. ५.२४ जो अपने अन्दर ही सुख, आनन्द, ज्योति को पाता है, मिलता है निर्वाण उसे, वह ब्रह्म रूप हो जाता है. ५.२५ जो पवित्र, निष्पाप, द्वैत के संशय जिन के दूर हुये, अनुशासित, परोपकारी, वे परम ब्रह्म में लीन हुये. ५.२६ काम, क्रोध से मुक्त हुए जो, मन अपने वश में जिन का, परम ग्यान जिन को है, होता है निर्वाण यहां उन का. ५.२७ लगा द्रिष्टि को बीच भ्रिकुटि के, सभी विषय का त्याग करे, पान, अपान वायु का सांसों से नियमित संचार करे. ५.२८ वश में कर इन्द्रियां, बुद्धि, चित, मोक्ष-प्राप्ति को तत्पर हो, काम, क्रोध, भय, से ऊपर, उस को सदैव ही मुक्त कहो. ५.२९ मैं सब यग्य, तपों का भोगी, लोकों पर शासन करता, सब का मित्र, इसे जो जाने, निश्चय शान्ति प्राप्त करता. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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