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भागवद गीता अध्याय-०६ ध्यान योग साप्ताहिक पाठ-१८/६.०१ योगेश्वर ने कहा: कर्म करे फल की इच्छा तज, योगी हो या सन्यासी, यग्य कुंड बस नहीं जलाये, नहीं बने वो सन्यासी. ६.०२ जिस को सन्यासी कहते हैं, उस को ही कहते योगी, संकल्पों के त्याग बिना, कोई भी नहीं बने योगी. ६.०३ जो चाहे योग तक पहुंचना, कर्म उसे साधन बनता, योग प्राप्त हो जाने पर ही, शम उस का साधन बनता. ६.०४ जब विषयों या कर्मों में, आसक्ति नहीं रह जाती है, त्याग करे संकल्पों का, तब योग प्राप्ति हो जाती है. ६.०५ अपने आप उठाये अपने को, न कभी देवे गिरने, आत्मन अपना मित्र बने, आत्मन ही अपना शत्रु बने. ६.०६ जिस ने अहंकार को जीता, आत्मन उस का मित्र बने, जो न जीत पाये अपने को, उस का आत्मन शत्रु बने. ६.०७ अहंकार जो जीत, शान्ति को पाये, आत्म-ग्यान पाये, सुख-दुख, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान, इन्हें समान पाये. ६.०८ इन्द्रियां जीते, सुद्रिढ़ रहे, जिस में हैं ग्यान और विग्यान, योग-युक्त वह, जिस को मिट्टी, पत्थर, सोना एक समान. ६.०९ मित्र, शत्रु, निष्पक्षी, तटस्थ, उदार-ह्रिदयी, अभिमानी, पापी, बन्धु, संत, सब से, समता का भाव रखे ग्यानी. ६.१० आत्म-नियन्त्रण करे, रहे एकाकी, हो इच्छा से मुक्त, परिग्रह की कामना न हो, मन भी परमात्मा में हो युक्त. ६.११ स्वच्छ भूमि जो ऊंची-नीची न हो, वहां आसन रखकर, कुशा घास, म्रिगछाल और हो वस्त्र साफ़ उस के ऊपर. ६.१२ चित्त, इन्द्रियां वश में कर, बैठे, मन को एकाग्र करे, आत्म-शुद्धि के लिये वहां, योगी अपना अभ्यास करे. ६.१३ शरीर, सिर, गर्दन को स्थिर कर के वह बैठे सीधा हो, और कहीं भी देखे नहीं, द्रिष्टि नासाग्र पर लगी हो. ६.१४ प्रशान्त मन वाला, निर्भय, ब्रह्मचर्य का पालन करता, मन को मेरी ओर मोड़कर बैठ, ध्यान मुझ पर करता. ६.१५ वह योगी, जिस का मन वश में, सदा योग में ही लग कर, प्राप्त करे निर्वाण, शान्ति, जो विद्यमान मेरे अन्दर. ६.१६ उस को योग नहीं, जो खाता ज़्यादा या कम खाता है, नहीं उसे भी, जो सोता है बहुत, या न सो पाता है. ६.१७ योगी नियमित कर्म करे, आहार, विहार करे परिमित, उस में अनुशासन दुख-नाशी, नींद, जागना हैं नियमित. ६.१८ चित्त, लालसा से हटकर, आत्मन में स्थित हो जाता है, सम-स्वरता को प्राप्त हुआ, वह योगलीन कहलाता है. साप्ताहिक पाठ-१९/६.१९ योगी का चित जैसे दीपक जलता वायुहीन स्थल पर, आत्मन से वह मेल कराये, पहले मति को वश में कर. ६.२० मति वश में होने से, चंचल चित्त शान्त हो जाता है, चेतनता आत्मन में पाकर, आनन्द परम पाता है. ६.२१ सुख जो परे इन्द्रि-सुख के, वह बुद्धि लगाकर है पाता, उसको पा, भौतिक तत्वों से विचलित कभी नहीं होता. ६.२२ जिसे प्राप्त कर समझे, इस से बड़ी प्राप्ति है कहीं नहीं, ऐसी स्थित में, बहुत बड़े दुख से भी विचलित हो न कहीं. ६.२३ वही योग की पुन्य स्थिति, जिस का न कभी दुख से संयोग, अटल बुद्धि, द्रिढ़ निश्चय, अभ्यासों द्वारा पाते वह योग. ६.२४ संकल्पों से उपजी, सभी कामनाओं को जो छोड़े, सभी ओर से, इन्द्रियों को, मति द्वारा वश में कर, मोड़े. ६.२५ बुद्धि लगाकर द्रिढ़ता से, मन को आत्मन में लीन करे, धीरे धीरे शान्ति प्राप्त कर, और न कोई ध्यान करे. ६.२६ होकर चंचल और विकल, जब यह मन दूर भाग जाये, उसे नियंत्रित कर, आत्मन के अन्दर, फिर वापिस लाये. ६.२७ सर्वोत्तम सुख प्राप्त करे, वो योगी जिस का मन हो शान्त, वो निष्पाप, ब्रह्म तक पहुंचा, हुआ रजोगुण जिस का शान्त. ६.२८ हो पापों से मुक्त, योग में आत्मन सदा लगाता है, आसानी से ब्रह्म स्पर्श कर, शीघ्र परम सुख पाता है. ६.२९ आत्मन में देखे सब प्राणी, सभी प्राणियों में आत्मन, समदर्शी वह योगी, निश्पक्षी होता है उस का मन. ६.३० जो मेरे अन्दर सब देखे, सब में देखे बस मुझ को, दूर नहीं रहता वह मुझ से, नहीं भूलता मैं उस को. ६.३१ मैं हूं सभी प्राणियों में, जब योगी मुझ को भजता है, कैसी भी हालत में हो, वह मुझ में निवास करता है. ६.३२ हे अर्जुन! जो समदर्शी, सब को अपने समान पाता, खुद चाहे सुख में या दुख में हो, वह योगी कहलाता. ६.३३ अर्जुन ने कहा: हे योगेश्वर! तुम ने जो समता का योग बताया है, मन की चंचलता से उस का आधार नहीं पाया है. ६.३४ चंचल, प्रचंड, बलशाली मन, सदा चाहता हठ करना, उस पर क़ाबू कठिन, जिस तरह कठिन हवा वश में करना. ६.३५ योगेश्वर ने कहा: नि:सन्देह कठिन है, चंचल मन को क़ाबू में करना, पर, वैराग्य और अभ्यासों से सम्भव वश में करना. ६.३६ योग-प्राप्ति है कठिन उसे, जो मन पर क़ाबू नहीं करे, जो संयमी, आत्म-बल रक्खे, वही योग को प्राप्त करे. साप्ताहिक पाठ-२०/६.३७ अर्जुन ने कहा: श्रद्धा होते भी मन को यदि अपने वश में नहीं करे, क्या होता उस का जो प्राणी सिद्धि को नहीं प्राप्त करे? ६.३८ ब्रह्म प्राप्ति से पहले ही जो, डगमग होकर भ्रष्ट हुआ, क्या वह फटे बादलों जैसा, कुछ न प्राप्त कर, नष्ट हुआ? ६.३९ पूरी तरह मिटा दे अब, हे योगेश्वर! मेरा संशय, तेरे सिवा नहीं कोई जो दूर कर सके यह संशय. ६.४० योगेश्वर ने कहा: अर्जुन, इस जग में या और लोक में उस का नाश न हो, भला काम जो करता प्राणी, उस की दुर्गति कभी न हो. ६.४१ योग मार्ग में असफल हो, वह पुन्य-लोक को जाता है, पुन: पवित्र, सम्रिद्ध व्यक्ति के घर में जन्मा जाता है. ६.४२ या वह बुद्धिमान योगी के कुल में ले सकता है जन्म, किन्तु इस जगत में, अति दुर्लभ होता इस प्रकार का जन्म. ६.४३ वहां प्रात करता उन संस्कारों को, जो पहले विकसे, यत्न करे उन के बढ़ने का, हों सम्पूर्ण यहां फिर से. ६.४४ हुआ विवश सा पिछले अभ्यासों से, उन्नति प्राप्त करे, जिग्यासु, योग द्वारा, शास्त्र बन्ध्नों को भी पार करे. ६.४५ पापों से हो मुक्त, कई जन्मों में निज को पूर्ण करे, प्राप्त करे सर्वोच्च लक्ष्य, यदि लगन लगाकर यत्न करे. ६.४६ तपस्वियों से बढ़कर योगी, ग्यानी से बढ़कर योगी, कर्म-कांडियों से बढ़कर वह, अर्जुन, तू बन जा योगी. ६.४७ सभी योगियों में उस योगी को ही श्रेष्ठ मैं समझता, जो श्रद्धा से अपने मन को मुझ में लगा, मुझे भजता. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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