BAFAyeM xOr lipiyAM xanek, lekin vebsAxiq xek!
Several languages and scripts on one website!
Please click on any of the following to read  texts in language indicated:

saral hindI saral gujarAtI Udrux laras

saral paMjAbI

Unicode

English saral ingles romanaagarii Spanish

Home Page
pahalA pannA

Literacy

SrI vidyA cAlIsA

SARAL Hindi and Shri Vidya Yantra
Computer literacy and SARAL scripts

SrI japujI sAhib

hindI BAgavad gItA
hindI BAgavad gItA
hindii bhagavad giitaa
bilAZ-ex-nAvId

dIvAn-xe-ZAlib

diivaan-e-g'aalib

saral hindI xOr SrI vidyA yantra

Albert Einstein and Mahatma Gandhi
Patanjali Yoga Sutra
Dattatreya Yoga
saral ingles

 

भागवद गीता

अध्याय-०७

ग्यान विग्यान योग

साप्ताहिक पाठ-२१/.०१ योगेश्वर ने कहा:

मन को मुझ में लगा, योग में लीन, मुझे ही आश्रय मान,

कैसे पूरी तरह मुझे जानेगा, अर्जुन, अब यह जान.

.०२

पूरी तरह बताऊंगा मैं तुझ को, ग्यान और विग्यान,

कुछ भी शेष नहीं रह जायेगा, जब लेगा इस को जान.

.०३

एक, हज़ारों में, मुझ को पाने का यहां यत्न करता,

उन में से विरला ही मेरा सच्चा रूप प्राप्त करता.

.०४

प्रिथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, बुद्धि, चित और अहंकार,

आठ तत्व ये प्रक्रिति में निहित, जिन से निर्मित है संसार.

.०५

यह मेरी है निम्न प्रक्रिति, बतलाऊं उच्च प्रक्रिति को भी,

चेतन जीव रूप, जिस पर आधारित है यह विश्व सभी.

.०६

यह भी समझ, सभी प्राणी दोनों से पैदा होते हैं,

मैं ही उन को देता जन्म, मेरे कारण ही मरते हैं.

.०७

मुझ से अलग वस्तुएं, अर्जुन, यहां नहीं कोई होतीं,

सब मुझ में, जैसे मणियां धागे में गुंथी हुई होतीं.

.०८

अर्जुन, मैं हूं जल में स्वाद, चांद, सूरज में प्रकाश हूं,

मैं वेदों में ओम, शब्द नभ में, पुरुषों में पौरुष हूं.

.०९

चमक अग्नि की हूं मैं, विशुद्ध सुगन्ध हूं मैं प्रिथ्वी में,

सभी प्राणियों में जीवन हूं, तप हूं बड़े तपस्वी में.

.१०

सारी विद्यमान चीज़ों का, बीज सनातन मुझ को मान,

बुद्धिमान की बुद्धि, तेज तेजस्वी का, मुझ को ही जान.

.११

इच्छा और काम के त्यागी, बलवानों का बल हूं मैं,

सभी प्राणियों के अन्दर, धर्मानुकूल चाहत हूं मैं.

साप्ताहिक पाठ-२२/.१२

गुण सात्विक, राजसिक, तामसिक, तीनों जन्मे हैं मुझ से,

वे मुझ से, मैं उन से नहीं, भली प्रकार जान ले इसे.

.१३

प्रक्रिति गुणों से भ्रम में पड़, जग मुझे नहीं पहचान सके,

मैं सब से ऊपर अविनाशी हूं, इस को ना जान सके.

.१४

तीन गुणों की माया को जीतना, बहुत मुश्किल होता,

जो मुझ को भजते, माया से बचना उन्हें सरल होता.

.१५

बुरे काम करने वाले जो मूर्ख, अधम, भरमाते हैं,

वे स्वभाव से राक्षस, मेरी शरण में नहीं आते हैं.

.१६

हे अर्जुन! मेरी पूजा करते हैं चार तरह के लोग,

दुख में फंसे, सत्य के प्रेमी, धन के इच्छुक, ग्यानी लोग.

.१७

इन में ग्यानी श्रेष्ठ, ब्रह्म में लीन, ध्यान में व्जो होता,

मैं उस का प्रिय हूं, वह भी मुझ को अति प्रिय सदैव होता.

.१८

यूं तो सब अच्छे, पर ग्यानी सर्वश्रेष्ठ, मैं भी वो हूं,

पूरी तरह योग में लग, उस का जो लक्ष्य, वही मैं हूं.

.१९

बाद बहुत से जन्मों के, ग्यानी समझे, सब ईश्वर है,

मैं होता हूं प्राप्त उसे, पर ऐसा ग्यानी दुर्लभ है.

साप्ताहिक पाठ-२३/.२०

जिन की मति हो गई विक्रित, मन की इच्छाओं पर चल कर,

जाते अन्य देवताओं को, अपने स्वभाव के बल पर.

.२१

किसी रूप में पूजे कोई भक्त मुझे, कर के श्रद्धा.

उसी रूप में सुद्रिढ़ बना देता हूं मैं उस की श्रद्धा.

.२२

पूजा करे किसी की भी, पर हो पूरी श्रद्धा उसमें,

वांछित फल मिल जाता है, वह फल उस को देता हूं मैं.

.२३

अल्प बुद्धि के लोग, यहां केवल अस्थाई फल पाते,

मिलते देव, देव पूजा से, मेरे भक्त मुझे पाते.

.२४

अग्यानी, जो मेरे असली स्वभाव को जानते नहीं,

व्यक्त मानते, मैं अव्यक्त हूं, उच्च ग्यान जानते नहीं.

.२५

ढका योग माया से, सम्मुख आता हूं मैं कभी नहीं,

मूर्ख जाने, जन्म और परिवर्तन से मैं बंधा नहीं.

.२६

जो अतीत में हुये, इस समय हैं, भविष्य में जो होंगे,

अर्जुन, मैं उन सब को जानूं, मुझे नहीं वे जानेंगे.

.२७

सब प्राणी इच्छा से और द्वेष से पैदा होते हैं,

किन्तु द्वन्द्व के चक्कर में पड़, भ्रम में खोये होते हैं.

.२८

पर वे पुन्यात्मा प्राणी, सब नष्ट हो गये जिन के पाप,

मुक्त द्वैत से, होकर स्थिर, मेरी पूजा करते हैं आप.

.२९

जरा, मरण से मुक्ति प्राप्त करने जो शरण मेरी आये,

आत्मन, ब्रह्म, कर्म, इन सब की पूरी बात जान जाये.

.३०

मैं हूं अनन्य, मैं ही शासक, प्रिथ्वी, देव, यग्य का हूं,

जो यह जाने उसे मरण पर दिव्य चेतना देता हूं.

ऊपर


प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय_०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ

saral hindI saral gujarAtI

Udrux laras

saral paMjAbI Unicode saral ingles romanaagarii English Spanish

Home Page/
pahalA pannA

©Shri Vidya Trust, Rishikesh
Please click here and Email your views/comments.

up / xUpar