| ||||||||||||||||||
|
|
भागवद गीता अध्याय-०८ अक्षर ब्रह्म योग साप्ताहिक पाठ-२४/८.०१ अर्जुन ने कहा: हे योगेश्वर! आत्मन क्या है? क्या है ब्रह्म? कर्म है क्या? क्या तत्वों का क्षेत्र जगत में? क्षेत्र देवताओं का क्या? ८.०२ यहां कौन सा यग्य श्रेष्ठ है, उस को कैसे पहचानें? वश में कर अपने को, मरते समय तुझे कैसे जानें? ८.०३ योगेश्वर ने कहा: ब्रह्म अनश्वर सर्वोपरि है, स्वभाव आत्मन को मानो, कारण सब का जो स्रजनात्मक शक्ति, कर्म उस को जानो. ८.०४ क्षर का है आधार प्रक्रिति, है पुरुष अमरता का आधार, हे अर्जुन! मैं ही शरीर में सब यग्यों का हूं आधार. ८.०५ म्रित्यु समय कोई, मुझ में ही ध्यान लगा, तन त्याग करे, कुछ भी संशय नहीं कि वो मेरी ही स्थिति को प्राप्त करे. ८.०६ करता हुआ ध्यान जिस का, अपने शरीर का त्याग करे, लगा रहे वह उसी ध्यान में, उसी दशा को प्राप्त करे. ८.०७ इसी लिये, तू मुझे याद कर सदा, और कर युद्ध यहां, मुझ में लगा बुद्धि, चित अपने, प्राप्त करेगा मुझे यहां. ८.०८ लगा योग में बुद्धि, कोई भी, परम पुरुष का ध्यान करे, भटके नहीं चित्त उस का, वह दिव्य पुरुष को प्राप्त करे. ८.०९ जो शासक, पोषक, सब का ग्याता, अनादि, अणुओं में है, उस का रूप अचिन्तनीय, तम नाशक, वह किरणों में है. ८.१० भक्ति योग से प्राण शक्ति को, केन्द्रित भौं के बीच करे, ऐसा कर, वह म्रित्यु समय, उस दिव्य पुरुष को प्राप्त करे. साप्ताहिक पाठ-२५/८.११ अब सुन वर्णन अक्षर का, संयमी जहां प्रवेश करते, कर जिस की कामना, ब्रह्मचारी आचरण शुद्ध करते. ८.१२ मन अपना द्रिढ़ कर, संयमित करे जो तन के द्वारों को; हो कर लीन योग में, प्राण-मार्ग में रोके सांसों को; ८.१३ मुंह से निकले शब्द ओम, यदि करता याद रहे मुझ को, त्यागे तन, छोड़े जग को, वह पाये दिव्य चेतना को. ८.१४ अन्य किसी का ध्यान न कर, मेरा सदैव ही ध्यान करे, वह अनुशासित योगी, मुझ को आसानी से प्राप्त करे. ८.१५ मुझ तक पहुंच, महान आत्मायें, सिद्धि प्राप्त हैं कर लेतीं, जग, दुख का घर है अस्थाई, इस में जन्म नहीं लेतीं. ८.१६ ब्रह्मलोक से नीचे सब लोकों से पुनर्जन्म होता, कर ले प्राप्त मुझे कोई, तब उस का जन्म नहीं होता. ८.१७ ब्रह्म्मा का दिन हज़ार युग का, हज़ार युग की होती रात, जिस ने जान लिया यह, उस को रात्रि, दिवस हैं पूरे ग्यात. ८.१८ दिन आने पर, अव्यक्त सब वस्तुएं प्रगट हो जाती हैं, होती रात, कहीं अव्यक्तता में विलीन हो जाती हैं. ८.१९ हाल बुरा अस्तित्वमान चीज़ों का बेबस ही होता, होता रूप विलीन रात्रि में, दिन में पुन: प्रगट होता. ८.२० ऐसी स्थिति से परे, अन्य अव्यक्त सनातन है अस्तित्व, मिटती अस्तित्वमान चीज़ें, पर रहता उस का अस्तित्व. ८.२१ वही अव्यक्त अनश्वर भी, सर्वोच्च स्थिति उस को कहते, जहां पहुंचकर नहीं लौटते, मेरा परम धाम कहते. ८.२२ जिस से यह संसार रचित, जिस में सब भूत निवास करें, हे अर्जुन! उस परम पुरुष को, अटल भक्ति से प्राप्त करें. ८.२३ अब वह समय बताता हूं, संसार छोड़ जब जाते हैं, या तो जग में नहीं लौटते, या फिर वापिस आते हैं. ८.२४ शुक्ल पक्ष, उजियाला, दिवस, अग्नि, छ: मास उत्तरायण के, इन में जग त्यागे कोई तो पहुंचे निकट परम ब्रह्म के. ८.२५ क्रिष्ण पक्ष, अंधकार, रात्रि, धुआं, छ: मास दक्षिणायन के, आ जाते हैं लौट यहीं पर, इन में चन्द्र ज्योति पा के. ८.२६ ज्योति और अन्धकार के, दो शाश्वत मार्ग कहे जाते, पहुंच ज्योति तक, नहीं लौटते, लौट ंधेरे से आते. ८.२७ उस ने दूर किया अपना भ्रम, जिस ने सही मार्ग जाना, अर्जुन, तेरे लिये उचित है, योग मार्ग में जुट जाना. ८.२८ वेदों के अध्ययन, दान, तप, पुन्य, यग्य के सारे फल, लगते हैं छोटे उस योगी को, जो पहुंचे ब्रह्म स्थल. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
|
| ||||||||||||||||||