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भागवद गीता

अध्याय-०९

राज विद्या राज गुह्य योग

साप्ताहिक पाठ-२६/.०१ योगेश्वर ने कहा:

अर्जुन, तू ईर्ष्या से रहित, समझ ले गोपनीय यह ग्यान,

मुक्त बुराई से होगा, जब लेगा इस विद्या को जान.

.०२

यह विद्या सब से पवित्र, यह परम ग्यान अनुभव से हो,

यह धर्मानुकूल, इस का अभ्यास सरल, यह नष्ट हो.

.०३

अर्जुन, जो धर्मानुसार श्रद्धा कभी कर पाते हैं,

मुझे कर के प्राप्त, लौटकर म्रत्यु-लोक में आते हैं.

.०४

मैं हूं निर्गुण, लेकिन, मैं हूं व्याप्त यहां सारे जग में,

सब मुझ पर आधारित, लेकिन मैं दिखाई दूं उन में.

.०५

यह रहस्य तू समझ, कहीं जीवों में मेरा वास नहीं,

सब को संभालती है मेरी आत्मा, रहती वहां नहीं.

.०६

जैसे नभ में सदैव चलती, वायु प्रचंड और गतिमान,

उसी तरह सब वस्तु करें मुझ में विचरण, तू इस को जान.

.०७

हुआ कल्प का अंत, प्रक्रिति में सब वस्तुएं समाती हैं,

वो मेरी ही प्रक्रिति, कल्प में फिर वापिस जाती हैं.

.०८

वस्तु निरंतर पैदा करता, सदा प्रक्रिति को कर वश में,

बेबस हैं सब पैदा होकर, सभी प्रक्रिति के बंधन में.

.०९

कभी बांधे मुझको, कोई कर्म किसी भी बंधन में,

अनासक्त और उदासीन, कर्मों के अन्दर रहता मैं.

.१०

हे अर्जुन! मेरी ही देख-रेख में जान इस प्रक्रिति को,

जिस से संसार-चक्र घूमे, मिलता जन्म चराचर को.

.११

मूर्ख लोग, मानव शरीर धर, अवहेलना करें मेरी,

जानें नहीं रूप स्वामी का, उच्च प्रक्रिति जो है मेरी.

.१२

वे असुरों का और राक्षसों का स्वभाव ले यहां रहें,

आशा, कर्म, ग्यान हैं विफल, बिना विवेक वे सदा रहें.

.१३

अर्जुन, महान आत्मा वाले, दिव्य प्रक्रिति में जो रहते,

मुझे अनश्वर, सब का मूल मान, मेरी पूजा करते.

.१४

नत होकर मेरे आगे, मेरा गुणगान सदा करते,

होकर स्थिर वे भक्ति भाव से, मेरी ही पूजा करते.

.१५

अन्य लोग ग्यान-यग्य द्वारा मेरी उपासना करते,

एक रूप या अनेक रूपों वाला जान मुझे भजते.

साप्ताहिक पाठ-२७/.१६

कर्म-कांड हूं मैं, पितरों का पिंड दान हूं, यग्य हूं मैं,

औषधि, मन्त्र और घी हूं मैं, अग्नि तथा आहुति हूं मैं.

.१७

माता, पिता, पितामह, धाता, पुन्य, ग्यान का लक्ष्य हूं मैं,

सामवेद, रिग्वेद, यजुर्वेद और ओम की ध्वनि हूं मैं.

.१८

पोषक, मित्र, निवास, शरण, स्वामी, साक्षी, उद्देश्य हूं मैं,

सर्वनाश, भंडार, स्थल, उत्पत्ति, अनश्वर बीज हूं मैं.

.१९

मैं तपता, मैं वर्षा करता, म्रित्यु, अमरता देता मैं,

अर्जुन, मैं हूं सत्य और उस के ही साथ असत्य हूं मैं.

.२०

पाप-मुक्त, वेदों के ग्यानी, सोम पान कर यग्य करें,

स्वर्ग लोक में पहुंच, वहां देवों के सब सुख प्राप्त करें.

.२१

स्वर्ग लोक से वापिस, फिर वे म्रित्युलोक में जाते,

वेद-धर्म का पालन कर, सुख-इच्छा से आते, जाते.

.२२

जो अध्यवसायी होकर, चिन्तन करते हैं मेरा ही,

उन के योग और हित दोनों को, संभालता हूं, मैं ही.

.२३

श्रद्धा से जो अन्य देवताओं की पूजा करते हैं,

यद्यपि पूर्ण नहीं, फिर भी वे मेरी पूजा करते हैं.

.२४

मैं सब यग्यों का उपभोगी, मैं सब का पालन करता,

मेरा असली रूप जाने, वह सदैव नीचे गिरता.

.२५

पूजें देव, देव पायें, पितरों को पूज, पितर पायें,

भूत पूज कर भूत मिलें, मुझ को पूजें, मुझ को पायें.

.२६

पत्ती, पानी, पुष्प और फल, मुझ को दे श्रद्धा के साथ,

निर्मल मन से दी भेंटें, मैं लेता सभी प्रेम के साथ.

.२७

अर्जुन, तू जो करता, खाता, और यग्य जो तू करता,

समझ मुझे उपहार सभी कुछ, दान और तप जो करता.

.२८

शुभ या अशुभ कर्म के सभी फलों से हो जायेगा मुक्त,

मुझे प्राप्त कर, त्याग मार्ग द्वारा, होगा बंधन से मुक्त.

.२९

मुझ को सभी समान, किसी से बैर, लगाव नहीं मुझ में,

भक्ति भाव से पूजा करते, मैं उन में हूं, वे मुझ में.

.३०

बड़ा दुराचारी, यदि त्यागे पाप और मुझ को भज ले,

समझो उस को धर्मात्मा, जो यह अच्छा निश्चय कर ले.

.३१

शान्ति चिरस्थाई मिलती है, पुन्यात्मा बन जाता है,

हे अर्जुन! यह सत्य, भक्त मेरा नष्ट हो पाता है.

.३२

औरत, वैश्य, शूद्र हो, चाहे नीचे कुल में जन्म लिया,

आकर मेरी शरण सभी ने, लक्ष्य उच्चतम प्राप्त किया.

.३३

फिर पवित्र ब्राह्मणों, राज-रिषियों का तो है क्या कहना,

अस्थाई, दुख भरे जगत में, धर्म, मेरी पूजा करना.

.३४

यग्य करो मेरे ही लिये, भजो अपने मन में मुझ को,

आओ मेरी शरण, युक्त हो मुझ में, प्राप्त करो मुझ को.

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