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भागवद गीता अध्याय-१० विभूति योग साप्ताहिक पाठ-२८/१०.०१ योगेश्वर ने कहा: हे अर्जुन! अब मेरे सब से ऊंचे वचनों को सुन तू, तुझे बताता हूं मैं वह, जिस से आनन्द परम ले तू. १०.०२ मेरा मूल जानने में रिषि और देव भी करते भूल, सब प्रकार से मैं ही सारे रिषियों, देवों का हूं मूल. १०.०३ मुझे अजन्मा, अनादि, सब का स्वामी, जिस ने जान लिया, म्रित्यु लोक में भ्रम से, पापों से, अपने को मुक्त किया. १०.०४ बुद्धि, क्षमा, संमोह-त्याग, इन्द्रि-नियंत्रण, ग्यान, सत्यता, सुख-दुख, अनस्तित्व, अस्तित्व, आत्म-संयम, भ्य, निर्भयता; १०.०५ यश, अपयश, संतुष्टि, अहिंसा, तप, समता, दानवीरता, ये सब दशा प्राणियों की हैं, जिन को मैं पैदा करता. १०.०६ सातों रिषि, चारों मनु, सब मुझ से ही होते हैं पैदा, वे सब मेरी प्रक्रिति से बने, उन से सब प्राणी पैदा. १०.०७ तत्व रूप में मेरी शक्ति और यश को जो जान गया, इस में संशय नहीं, योग से उस ने मुझ को प्राप्त किया. १०.०८ मैं सब का उत्पत्ति स्थल हूं, मुझ से स्रिष्टि चले सारी, ग्यानी इस को जान, रखें विश्वास, करें पूजा मेरी. १०.०९ जीवन मुझ पर अर्पित कर, जो बुद्धि लगाते हैं मुझ में, मेरी चर्चा कर आपस में, आनंद प्राप्त करें मुझ में. १०.१० करें निरंतर भक्ति मेरी, प्रेम से करें पूजा मेरी, उन्हें बुद्धि एकाग्र मिले, उन को हो शरण प्राप्त मेरी. १०.११ दया दिखाता सब पर, अपने असल रूप में रहता हूं, ग्यान दीप से उन के मन के अंधकार को हरता हूं. साप्ताहिक पाठ-२९/१०.१२ अर्जुन ने कहा: परम ब्रह्म तू, परम धाम तू, पावन तू, परमेश्वर तू, तू है प्रथम देवता, तू है अजन्म, सर्वव्याप्त है तू. १०.१३ नारद, असित, व्यास, देवल ने ऐसा ही बतलाया है, सब रिषियों ने यही कहा, अब तू ने यही बताया है. १०.१४ योगेश्वर, मैं सत्य मानता, जो कुछ भी तू कहता है, तेरा रूप, देवता, राक्षस, कोई नहीं जानता है. १०.१५ पुरूषोत्तम, सब का स्वामी, देवता सभी देवों का तू, जगत पिता, मूल तू सभी का, सब कुछ आप जानता तू. १०.१६ अपने सभी दिव्य रूपों को अब तू बतला दे मुझ को, जिन के द्वारा सब लोकों में व्याप्त हुआ समझूं तुझ को. १०.१७ कैसे, नित चिन्तन कर के, पाऊं मैं तेरा पूरा ग्यान, किन विभिन्न रूपों में, हे योगेश्वर! हो तेरी पहचान. १०.१८ क्रिष्ण, बता तू अपनी शक्ति, विभूति, सभी वर्णन कर के, नही अघाता हूं मैं अम्रित जैसे वचनों को सुन के. साप्ताहिक पाठ-३०/१०.१९ योगेश्वर ने कहा: हे अर्जुन! मैं तुझ को अपनी दिव्य विभूति बताऊंगा, अंत नहीं उस का, मैं केवल अंश मात्र बतलाऊंगा. १०.२० सभी प्राणियों के ह्रिदयों में बसी हुई आत्मा हूं मैं, सभी वस्तुओं का प्रारम्भ, मध्य भी और अंत भी मैं. १०.२१ आदित्यों में विष्णु, प्रकाशों में ज्योतिर्मय सूर्य हूं मैं, मरुतों में मरीचि हूं मैं, नक्षत्रों में चन्दा हूं मैं. १०.२२ वेदों में हूं सामवेद, मैं इन्द्र देवताओं में हूं, सभी प्राणियों में चेतनता, इन्द्रियों से ऊपर मन हूं. १०.२३ कुबेर यक्षों और राक्षसों में, शंकर हूं रुद्रों में, पर्वत के शिखरों में मेरु, अग्नि हूं सारे वसुओं में. १०.२४ हे अर्जुन! मैं पुरोहितों में मुख्य पुरोहित ब्रिहस्पति हूं, स्कन्द हूं सेनापतियों में, जलाशयों में सागर हूं. १०.२५ महान रिषियों में भ्रिगु हूं, वाणी में अक्षय ओम हूं मैं, यग्यों में जप यग्य, हिमालय अचल वस्तुओं में हूं मैं. १०.२६ व्रिक्षों में पीपल हूं और दिव्य रिषियों में नारद हूं, सिद्धों में हूं कपिल, चित्ररथ महान गन्धर्वों में हूं. १०.२७ अम्रित से उत्पन्न हुआ उच्चैश्रवा हूं मैं अश्वों में, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत, राजा हूं मैं मनुजों में. १०.२८ शस्त्रों में हूं वज्र और गौओं में कामधेनु हूं मैं, कामदेव सन्तानोत्पत्ति में, सर्पों में वासुकि हूं में. १०.२९ मैं नागों में अनंतनाग हूं, वरुण सभी जलदेवों में, पुतरों में अर्यमा और यम हूं मैं संयमशीलों में. १०.३० दैत्यों में हूं मैं प्रह्लाद, गिनती के लिये काल हूं मैं, गरुड़ पक्षियों में हूं, पशुओं में पशुराज सिंह हूं मैं. १०.३१ पवित्र करने वालों में हूं पवन, राम हूं वीरों में, मच्छों में हूं मगरमच्छ, गंगा हूं बहती नदियों में. १०.३२ स्रिजित वस्तुओं का प्रारम्भ, मध्य भी और अंत भी मैं, ग्यानों में आध्यात्म ग्यान, मैं तर्क हूं वाद-विवादों में. साप्ताहिक पाठ-३१/१०.३३ मैं हूं काल अनश्वर, अक्षर में अ, द्वन्द्व समासों में मैं हूं वही विधाता जिस के मुख हैं सभी दिशाओं में. १०.३४ सब को निगले वही म्रित्यु हूं, भविष्य का उद्गम हूं मैं, नारी में श्री, कीर्ति, स्म्रिति, ध्रिति, वाणी, बुद्धि, क्षमा हूं मैं. १०.३५ गीतों में हूं बड़ा साम, गायत्री हूं मैं छन्दों में, माघ महीनों में हूं, पुष्पित वसंत हूं मैं रितुओं में. १०.३६ छलने वालों का जूआ हूं, तेजस्वी का तेज हूं मैं, मैं हूं विजयी का प्रयत्न, अच्छों में अच्छाई हूं मैं. १०.३७ पांडव पुत्रों में अर्जुन हूं, वासुदेव हूं व्रिष्णियों में, मुनियों में हूं व्यास और उशना कवि हूं मैं कवियों में. १०.३८ नीति विजय पाने वालों की, दंड शासकों का हूं मैं, मौन रहस्यपूर्ण चीज़ों का, ग्यान ग्यानियों का हूं में. १०.३९ हे अर्जुन! सारी चीज़ों का बीज मेरे अंदर होता, नहीं चराचर कोई, जो मौजूद बिना मेरे रहता. १०.४० इतनी विभूतियां हैं मेरी, अंत नहीं होगा उन का, अर्जुन, बतलाया है मैंने, अंशमात्र उस महिमा का. १०.४१ जो कोई भी गौरव, शोभा, ऊर्जा से उत्पन्न हुआ, उस का जन्म, समझ, मेरे ही तेजस्वी अंश से हुआ. १०.४२ अर्जुन, क्या आवश्यकता, तू सीखे इतना गहरा ग्यान, मेरे सूक्ष्म अंश के ऊपर, टिका हुआ यह विश्व महान. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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