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भागवद गीता अध्याय-११ विश्व रूप दर्शन योग साप्ताहिक पाठ-३२/११.०१ अर्जुन ने कहा: आत्मा का तूने, योगेश्वर, परम रहस्य बताया है, उस ने मेरे मन के सारे भ्रम को दूर कराया है. ११.०२ सभी वस्तुओं की उत्पत्ति और उन्नति का ग्यान सुना, तेरे अक्षय, अनंत गौरव को मैंने सम्पूर्ण सुना. ११.०३ योगेश्वर, यदि ऐसा ही है, जैसा बतलाया मुझ को, तो अपने ईश्वरी रूप को भी अब दिखला दे मुझ को. ११.०४ यदि समझे, तेरा वह रूप दिखाई दे सकता मुझ को, हे योगेश्वर! अपना रूप अनश्वर दिखला दे मुझ को. ११.०५ योगेश्वर ने कहा: हे अर्जुन! मेरे सैकड़ों, हज़ारों रूपों को तू देख, विविध रंगों, आक्रितियों वाले, अनगिन दिव्य रूप तू देख. ११.०६ आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनों और मरुतों को देख, कभी नहीं देखे पहले, उन अनेक आश्चर्यों को देख. ११.०७ हे अर्जुन! तू जम कर आज यहां सब चराचरों को देख, जो चाहे देखना उसे एकत्रित मेरे तन में देख. ११.०८ किन्तु मानवी आंखों से तू, मुझे नहीं पायेगा देख, दिव्य द्रिष्टि देता हूं, जिस से मेरी दिव्य शक्ति को देख. ११.०९ संजय ने कहा: इस प्रकार कहकर, योगेश्वर ने अर्जुन को समझाया, अपना ईश्वरीय, सर्वोच्च रूप उस को तब दिखलाया. ११.१० अनेक मुख, आंखों वाले अद्भुत शरीर सम्मुख आये, दिव्य भूषणों से शोभित, अनगिनती दिव्य शस्त्र पाये. ११.११ लेप, वस्त्र, मालायें और इत्र हैं लगे हुये तन पर, विस्मयकारी, दिव्य, बड़े मुख दीख रहे हैं इधर उधर. ११.१२ ज्योति हज़ारों सूर्यों की यदि एक साथ नभ में चमके, उस महान छवि का तेजस्वी रूप उस तरह से दमके. ११.१३ देवों के शरीर को भी तब अनेक रूपों में देखा, बंटे हुये सारे लोकों को एक जगह केन्द्रित देखा. ११.१४ हुये रोंगटे खड़े, वीर अर्जुन ने आश्चर्य भी किया, शीश झुकाकर, हाथ जोड़कर, श्री क्रिष्ण को प्रणाम किया. साप्ताहिक पाठ-३३/११.१५ अर्जुन ने कहा: सभी देवता, अनेक प्राणी-समूह, मैं हूं देख रहा, कमलासन पर ब्रह्म्मा, रिषियों, नागों को भी देख रहा. ११.१६ बांह, पेट, मुख, और नेत्र, सब अनंत रूपों में आये, किन्तु कहीं भी आदि, मध्य या अंत नहीं उन के पाये. ११.१७ मुकुट, गदा, चक्रादि सभी के तेज रूप मैं देख रहा, ज्योतिर्मय सूर्य की तरह वो आग धधकती देख रहा. ११.१८ तू है विश्राम स्थल जगत का, तू है ग्यान और भगवान, तू है अमर धर्म का रक्षक और सनातन तू इन्सान. ११.१९ शक्ति अनंत, असंख्य भुजायें, सूरज, चांद नेत्र तेरे, आदि, अंत, मध्य से रहित, है अग्नि भरी मुंह में तेरे. ११.२० नभ, प्रिथ्वी पर, सभी दिशा में, व्याप्त अकेला तेरा रूप, तीनों लोक कांप उठते हैं, देख भयंकर तेरा रूप. ११.२१ देवों के समूह तुझ में कर प्रवेश, तेरी स्तुति करते, रिषि, मुनि भी मंत्रों द्वारा कह स्वस्ति तुझे शोभित करते. ११.२२ रुद्र, अदित्य, साध्य, वसु, अश्विनि, गन्धर्व, मरुत और पितर, यक्षों, असुरों, सिद्धों के समूह देखें विस्मित होकर. ११.२३ अनेक मुख, आंखों, बांहों, जांघों, पैरों, पेटों वाला, कांप रहा हूं, देख तेरा यह रूप बड़े दांतों वाला. ११.२४ चौड़ा मुंह, विशाल आंखें, नभ तक रंगीनी दमक रही, धैर्य, शान्ति हैं भंग, अंतरात्मा भी डर से कांप रही. ११.२५ मुंह में देख बड़े दांतों को, लपटों को, लगता है डर, योगेश्वर! स्वामी जग के! आश्रय दो! दया करो मुझ पर! ११.२६ ध्रितराष्ट्र के सभी बेटे, भीष्म, कर्ण और द्रोण के साथ, राजाओं के समूह सारे, प्रधान योद्धाओं के साथ; ११.२७ घुसे जा रहे लम्बे दांतों के मुंह में बेबस होकर, वे दांतों में फंसे पड़े या चूर हो रहे हैं पिस कर. ११.२८ जैसे वेगवती नदियां सागर में मिलने को जातीं, वैसे वीरों की टोली, लपटों वाले मुंह में आतीं. ११.२९ जैसे जलती हुई आग में, पतंग तेज़ी से जाते, उसी तरह योद्धा विनाश के लिये तेरे मुंह में आते. ११.३० अपने लपटों के मुख में, तू सब लोकों को निगल रहा, तेरी तेज भरी किरणों से, सारा जग है झुलस रहा. ११.३१ तू है कौन भयानक? श्रेष्ठ देव! करता प्रणाम तुझ को, कर दे क्रिपा, बता अपने को, तेरा कुछ न पता मुझ को. साप्ताहिक पाठ-३४/११.३२ योगेश्वर ने कहा: मैं हूं काल विनाशक, सब लोकों को मैं करता हूं नष्ट, दोनों सेनाओं के योद्धा, बिन तेरे भी होंगे नष्ट. ११.३३ उठकर जीत शत्रुओं को, यश मिले, राज्य पर शासन कर, ये मुझ से मर चुके किन्तु, अर्जुन, बन इस का कारण भर. ११.३४ भीष्म, जयद्रथ, द्रोण, कर्ण, इन सारे योद्धाओं को मार, ये तो हैं विनष्ट, मत डर, युद्ध में न होगी तेरी हार. ११.३५ संजय ने कहा: सुन कर इन वचनों को अर्जुन, हाथ जोड़ कुछ विस्मय से, डर से कांप, रुंधी वाणी में, यूं बोला योगेश्वर से. ११.३६ अर्जुन ने कहा: जो तेरा यशगान कर रहे, आनंद का अनुभव करते. राक्षस डर कर भाग रहे हैं, सिद्ध तेरा आदर करते. ११.३७ तू अनंत देवों का स्वामी, बड़ा ब्रह्म से भी है तू, तू है अनस्तित्व, अस्तित्व, परे उस से जो भी, है तू. ११.३८ तू ही आदि पुरुष, तू ग्याता, तू ही ग्येय, लक्ष्य भी तू, हे अनंत रूपों वाले! जो जग में व्याप्त, वही है तू. ११.३९ वायु, विनाशक, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा तुझे नमता हूं मैं, तू ही पिता और पति सब का, नमस्कार करता हूं मैं. ११.४० नमस्कार आगे, पीछे से, सभी ओर तू ही तो है, तेरी शक्ति असीम, रमा सब में, सब कुछ तू ही तो है. ११.४१ बिन पहचाने तेरी महिमा, मान लिया साथी तुझ को, अग्यानता, प्रेम, लापरवाही से कहा सखा तुझ को. ११.४२ खाते, सोते, और खेलते, तुझे नहीं सम्मान दिये, हे योगेश्वर! क्षमा याचना करता हूं मैं, इसी लिये. ११.४३ तू है जगत पिता, गुरु आदरणीय, सभी को पूज्य है तू, कोई नहीं तीन लोकों में तुझ सा, अति अनुपम है तू. ११.४४ झुकता हूं प्रणाम करने, हे देव! क्षमा कर दे मुझ को, जैसे पिता, मित्र, प्रेमी करते निज पुत्र, मित्र, प्रिय को. ११.४५ आनंदित हूं देख रूप जो पहले कभी न देखा था, कांप रहा भय से, अब दिखला रूप वही जो पहला था. ११.४६ देखूं तुझ को किरीटधारी, गदा, चक्र को लिये हुये, सहस्र बांहों के स्थान पर, चार भुजायें लिये हुये. साप्ताहिक पाठ-३५/११.४७ योगेश्वर ने कहा: दिव्य शक्ति से मैंने तुझ को, सर्वप्रथम दिखलाया है, दर्शन परम ब्रह्म का पहले नहीं किसी ने पाया है. ११.४८ मनुज लोक में तेरे सिवा न कोई देख सका इस को, वेद, यग्य, तप, क्रिया, दान, विद्या से पा न सका इस को. ११.४९ घबरा नहीं, न हो विमूढ़ तू, मेरा रूप भयानक देख, भय को त्याग, मुदित होकर, अब मेरे अन्य रूप को देख. ११.५० संजय ने कहा: यह कहकर योगेश्वर ने अपना पहला ही रूप लिया, सौम्य रूप धारण कर, डरे हुये अर्जुन को शान्त किया. ११.५१ अर्जुन ने कहा: क्रिष्ण, तुझे इन्सान देख, मैं अभी होश में आया हूं, अपनी साधारण हालत को फिर से वापिस लाया हूं. ११.५२ योगेश्वर ने कहा: तूने देखा रूप, कठिनता से ही जिसे देख सकते, ऐसा रूप देखने को तो देव सदैव हैं तरसते. ११.५३ जैसा रूप अभी देखा, उसको न कोई पहचान सके, वेद, तपस्या, दान, यग्य द्वारा से न जान सके. ११.५४ यदि कोई बन जाये मेरा भक्त, देख वह सकता है, और बताऊं, अर्जुन, मुझ में प्रवेश भी कर सकता है. ११.५५ कर्म मुझे अर्पित कर, जो मेरी ही पूजा करता है, हो आसक्ति-रहित, शत्रु-रहित, मुझ तक वही पहुंचता है. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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