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भागवद गीता अध्याय-१२ भक्ति योग साप्ताहिक पाठ-३६/१२.०१ अर्जुन ने कहा: कोई पूजा करे तुम्हारी, कोई अव्यक्त को माने, योगेश्वर, बतलाओ, इन दोनों में कौन अधिक जाने? १२.०२ योगेश्वर ने कहा: मन को मुझ में लगा तथा निष्ठा, श्रद्धा से हो सम्पूर्ण, पूजा करते मेरी, वही योग में सब से ज़्यादा पूर्ण. १२.०३ जो करते पूजा उस की जो अविनाशी, कूटस्थ, अचल, निराकार, सर्वव्याप्त, परे ध्यान के, अव्यक्त, और अटल; १२.०४ इन्द्रियों को अपने वश में कर, समता से देखें सब को, सब के हित में आनन्दित, वे भी तो प्राप्त करें मुझ को. १२.०५ जिन के विचार अव्यक्त पर, उन को उपास्ना बहुत कठिन, निर्गुण लक्ष्य, देह वालों को, पाना होता बहुत कठिन. १२.०६ पर जो लोग सभी कर्मों को मुझ पर हैं अर्पित करते, भक्ति भाव से मेरा ध्यान करें, मेरी पूजा करते. १२.०७ अपना मन मुझ पर केन्द्रित कर, रखते हैं जो शुद्ध विचार, म्रित्यु लोक के पापों से, मैं शीघ्र करूं उन का उद्धार. १२.०८ तन को वश में कर पहले, फिर अपना चित्त लगा मुझ में, यह अभ्यास करे तो निश्चय ही तू वास करे मुझ में. १२.०९ अर्जुन, तन को वश में कर यदि तू मुझ में नहीं आ सकता, ग्यान प्राप्ति का प्रयत्न कर, जिस से तू मुझ को पा सकता. १२.१० यदि हो ग्यान कठिन, तो मेरे चिन्तन का ही लक्ष्य करे, मुझ पर अपना ध्यान लगाता रहे, सिद्धि को प्राप्त करे. १२.११ यदि असमर्थ इसे भी करना, योग शरण जाना अच्छा, अपने को वश में कर के, तू त्याग कर्म फल की इच्छा. १२.१२ अभ्यास से ग्यान उत्तम है, ध्यान, ग्यान से है उत्तम, जिस से शान्ति मिले, वह फल का त्याग, ध्यान से भी उत्तम. १२.१३ योगी सब का मित्र, करुण, धैर्यवान, बैर नहीं रखता, अहंकार, ममता से ऊपर, समान सुख, दुख में रह्ता. १२.१४ द्रिढ़ निश्चय वाला, सन्तुष्ट, रखे जो वश में अपने को, करे समर्पित चित्त, बुद्धि मुझ पर, वो प्रिय होता मुझ को. १२.१५ जिस से जग घबराता नहीं, न जग से जो घबराता है, हर्ष, ईर्ष्या, भय, चिन्ता से मुक्त, मुझे प्रिय होता है. १२.१६ उदासीन, अनपेक्ष, व्यथा से दूर, दक्ष, जो निर्मल है, त्याग दिये जिस ने सब कर्मारम्भ, वही मुझ को प्रिय है. १२.१७ प्रसन्नता, इच्छा, दुख, द्वेष सभी से विरक्त जो होता, भले-बुरे का त्यागी, भक्ति करे मेरी, वो प्रिय होता. १२.१८ शत्रु, मित्र जिस को समान हैं, मान और अपमान समान, नहीं लगाव किसी से, सुख-दुख, सर्दी-गर्मी एक समान. १२.१९ जिसे प्रशंसा, निन्दा सम, जो मौन और सन्तोषी है, निश्चय नहीं निवास स्थल, मति अटल, भक्त मुझ को प्रिय है. १२.२० श्रद्धा से जो मुझ को अपना ऊंचा लक्ष्य समझते हैं, वही भक्त मुझ को अति प्रिय, जो अमर ग्यान पर चलते हैं. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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