| ||||||||||||||||||
|
|
भागवद गीता अध्याय-१३ क्षेत्र क्षेत्रग्य विभाग योग साप्ताहिक पाठ-३७/१३.०१ अर्जुन ने कहा: हे योगेश्वर! यह बतलाओ, क्या है प्रक्रिति? पुरुष है क्या? क्या हैं क्षेत्र और क्षेत्रग्य? लक्ष्य है ग्यान, ग्येय का क्या? १३.०२ योगेश्वर ने कहा: अर्जुन, भौतिक शरीर सब का, क्षेत्र यही कहलाता है, जो इस को जाने वह ग्यानी, क्षेत्रग्य कहा जाता है. १३.०३ सारे क्षेत्रों का क्षेत्रग्य यहां केवल मुझ को ही जान, क्षेत्र और उस के ग्यानी का ग्यान, समझ ले सच्चा ग्यान. १३.०४ अब सुन क्या है क्षेत्र, किस तरह का, परिवर्तन क्या उस में, कैसे आया है, कितना है, और शक्तियां क्या उस में. १३.०५ रिषियों के मन्त्रों में इस का गान बहुत है किया गया, इस का वर्णन तर्क-शास्त्र के सूत्रों में भी बहुत हुआ. १३.०६ पांच तत्व, मति, अहंकार, अव्यक्त साथ जो है उन के, दस इन्द्रियां, संग उन के चित, पांच विषय जो इन्द्रियों के. १३.०७ सुख, दुख, इच्छा, द्वेष, चेतना, ध्रिति व शरीर जहां रहते, उन के साथ विकार उन्हीं के, समझो क्षेत्र उसे कहते. १३.०८ सर्वश्रेष्ठ कहना न स्वयम को, क्षमा, अहिंसा, विनम्रता, गुरु-सेवा, शुद्धता, सरलता, आत्म-संयम एवम द्रिढ़ता; १३.०९ विषयों से वैराग्य, अहम का त्याग, सभी दोषों का ग्यान, जन्म, म्रित्यु, व्रिद्धावस्था, बीमारी, दुख, सब की पहचान; १३.१० अनासक्ति; सन्तान, वधू, घर, सब से मोह नहीं करना; अच्छी बुरी सभी घटनाओं के प्रति भाव एक रखना; १३.११ सदा अनन्य योग से प्रेरित, मुझ में अटल भक्ति रख्ना, रहना एकान्त में, तथा जन-समुदाओं से भी बचना; १३.१२ लीन हमेशा आत्म-ग्यान में, परम सत्य का करना ध्यान, सच्चा ग्यान यही, इस से जो भिन्न उसे कहते अग्यान. १३.१३ करे अमरता प्राप्त, ग्यान जो ले मुझ से उस का शाश्वत, वह अनादि है, सत भी वही, उसे कह सकते नहीं असत. १३.१४ हाथ पैर सब जगह, आंख, सिर, मुख वह सभी जगह रखता, चारों ओर कान उस के, सब जग उस में निवास करता. १३.१५ उस में सभी इन्द्रियों के गुण, बिना इन्द्रियों के है वो, अनासक्त, सब को संभालता, गुण बिन भोग करे है वो. १३.१६ वह सब के बाहर, अंदर भी, अचल और चलता भी है, इतना छोटा, देख न पायें, बहुत दूर, वो पास भी है. १३.१७ वह अविभक्त, लगे विभक्त, सब का पालन पोषण करता, सब को विनष्ट कर के वह फिर से उन को पैदा करता. १३.१८ ज्योति, ंधेरा दोनों उस में, हर दिल में जानो उस को, ग्यान, ग्यान का विषय, ग्यान का लक्ष्य, सभी मानो उस को. १३.१९ क्षेत्र, ग्यान, ग्यान के विषय का वर्णन है संक्षिप्त किया, भक्त मेरा जो इस को समझे, उस ने मुझ को प्राप्त किया. साप्ताहिक पाठ-३८/१३.२० प्रक्रिति, पुरुष दोनों अनादि हैं, अर्जुन, तू इस को ले जान, रूप और गुण पैदा हुये प्रक्रिति से, इस को भी पहचान. १३.२१ कार्य, और उस के साधन का कारण प्रक्रिति बताते हैं, आत्मन को सुख-दुख के अनुभव का कारण बतलाते हैं. १३.२२ पैदा हुये प्रक्रिति द्वारा गुण, भोग पुरुष का बनते हैं, गुण ही जग में अच्छे, बुरे जन्म का कारण बनते हैं. १३.२३ तन में स्थित परमेश्वर साक्षी, अनुमति देने वाला है, उपभोगी, महान प्रभु, वह सब को संभालने वाला है. १३.२४ जो भी गुण के साथ प्रक्रिति, आत्मा का भेद जान लेता, कोई भी वह कर्म करे, दोबारा जन्म नहीं लेता. १३.२५ कुछ परमात्मा को निज मन से आत्मन में देखें, कर ध्यान, अन्य, दिव्य-दर्शन पाने को करें कर्म या पायें ग्यान. १३.२६ बहुत लोग इस को न समझते, सुनने में आस्था रखते, वे भी तो तर जाते हैं, जो सुन कर उपासना करते. १३.२७ हे अर्जुन! तू समझ, चराचर जीव यहां पर जो होते, क्षेत्र और क्षेत्रग्य मिलन द्वारा ही वे पैदा होते. १३.२८ जो परमात्मा को सब चीज़ों में निवास करता देखे, केवल चीज़ नष्ट होतीं, परमात्मा नहीं, इसे देखे. १३.२९ सभी रूप में विद्यमान, ईश्वर सब जगह निवास करे, मन से आत्मन को न कष्ट दे, तभी लक्ष्य को प्राप्त करे. १३.३० सारे कर्म प्रक्रिति से होते, जो प्राणी इस को देखे, वह जाने आत्मा न करे कुछ, केवल कर्मों को देखे. १३.३१ जो देखता इसे कि विविधता सब प्रभु में केन्द्रित होती, उस से ही जग विस्त्रित होता, ब्रह्म प्राप्ति उस को होती. १३.३२ आत्मा निर्गुण, अमर, अनश्वर, यद्यपि शरीर में होती, फिर भी कोई कर्म न करती, लिप्त नहीं तन में होती. १३.३३ जैसे आकाश सर्वव्यापी, लिप्त किसी वस्तु में नहीं, उसी तरह आत्मा शरीर में स्थित है, लेकिन लिप्त नहीं. १३.३४ अर्जुन, जैसे सूर्य प्रकाशित करता है सारे जग को, उसी तरह स्वामी क्षेत्रों का, करे प्रकाशित क्षेत्रों को. १३.३५ फ़र्क़ क्षेत्र, क्षेत्रग्य बीच, तोड़ना प्रक्रिति के बंधन को, देखे जो ग्यान चक्षु द्वारा, पाये वही परम ब्रह्म को. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
|
| ||||||||||||||||||