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भागवद गीता अध्याय-१४ गुणत्रय विभाग योग साप्ताहिक पाठ-३९/१४.०१ योगेश्वर ने कहा: अर्जुन, सुन ले अब वह ग्यान, जिसे सर्वोत्तम बतलाते, जिसे जान कर मुनिजन ऊपर उठते, परम सिद्धि पाते. १४.०२ इस ग्यान के सहारे मुझ को पाते, जन्म नहीं लेते, और प्रलय के आने पर वे बेबस दुखी नहीं होते. १४.०३ ब्रह्म विशाल गर्भ सब का, मैं बीज डालता हूं उस में, प्राणी और वस्तुयें सारी, पैदा होती हैं जिस में. १४.०४ अर्जुन, जहां कहीं भी रूप योनि से है पैदा होता, ब्रह्म समान योनि सब की, मैं पिता समान बीज बोता. १४.०५ सत्व, रजस, तम ये गुण तीन, प्रक्रिति से पैदा होते हैं, अर्जुन, ये ही आत्मा को शरीर से बांधे रखते हैं. १४.०६ इन में सत्व विशुद्ध, प्रकाश, स्वास्थ्य होते इस के कारण, ग्यान और आनन्द से मनुज बंधता है इस के कारण. १४.०७ रजस है अनुरागात्मक, जिस से आसक्ति, चाह पैदा है, यह आत्मन को आसक्ति से कर्म में जकड़े रहता है. १४.०८ तमगुण में होता अग्यान, सभी प्राणी भ्रम में इस से, लापर्वाही, आलस, निद्रा में फंस जाते हैं जिस से. १४.०९ सतगुण से आनन्द, रजोगुण से कर्मों को पा लेते, किन्तु तमोगुण से मति ढककर, पागल्पन में ही रहते. साप्ताहिक पाठ-४०/१४.१० कभी सतोगुण विजयी होता, रजगुण, तमगुण के ऊपर, कभी रजस विजयी सत, तम पर, या तम विजयी सत, रज पर. १४.११ शरीर के सब द्वारों से जब ग्यान प्रकाश निकलता है, तब यह समझा जा सकता है, वहां सतोगुण बढ़ता है. १४.१२ लोभ, लालसा, अशान्ति, गतिविधि, अनुचित कार्यों का प्रारम्भ, जब बढ़ता है रजोगुण तभी ये सब होते हैं आरम्भ. १४.१३ प्रकाश का अभाव, निष्क्रियता, लापरवाही व मूढ़ता, जब चढ़ता है तमगुण, तब इन का भी है प्रकोप बढ़ता. १४.१४ जब सतगुण प्रधान, आत्मा यदि देह त्याग कर जाती है, तब वह ग्यान से भरे शुद्ध लोक को सीधी जाती है. १४.१५ जन्म कर्मशीलों में ले, यदि वह रजगुण में तन त्यागे, जन्मे केवल मूढ़ योनियों में, यदि तम्गुण में त्यागे. १४.१६ सतगुण में कर्मों का फल सुखकर, जिस से मिलता है ग्यान, रजगुण में फल होता दुख, तमगुण में फल होताअ अग्यान. १४.१७ ग्यान सतोगुण से होता है, लोभ रजोगुण से होता, पागलपन, पीड़ादायक अग्यान, तमोगुण से होता. १४.१८ रजगुण में बीच में रहें, सतगुण में जायें ऊपर को, तमगुण में जघन्य कर्मों में लगकर, जायें नीचे को. साप्ताहिक पाठ-४१/१४.१९ जब द्रिष्टा, कर्मों का कर्ता, तीन गुणों को ही माने, गुण से परे कौन? यह जाने, मेरा स्वरूप पहचाने. १४.२० गुण से ऊपर उठ कर जब, वह देह त्याग कर जाता है, जन्म, मरण, व्रिद्धावस्था, दुख से विमुक्त हो जाता है. १४.२१ अर्जुन ने कहा: तीन गुणों से ऊपर जो होता, हम पहचानें कैसे? रहन सहन कैसा उस का? गुण से ऊपर उठता कैसे? १४.२२ योगेश्वर ने कहा: जब प्रकाश, गतिविधि या मोह रहें, वह माने बुरा नहीं, जब वे नहीं रहें तब उन के लिये कामना करे नहीं. १४.२३ उदासीन की भांति गुणों से हिले नहीं, निश्चल रहता, गुण ही सारे कर्म करें, इस को वह जान सुद्रिढ़ रहता. १४.२४ सुख, दुख हैं समान; मिट्टी, सोना, पत्थर हैं एक समान; मन है स्थिर; प्रिय-अप्रिय एक हैं; निन्दा-स्तुति हैं एक समान, १४.२५ मान और अपमान एक से, मित्र, शत्रु हैं एक समान, कर्म फलों का त्याग करे जो, उस को गुणातीत ही जान. १४.२६ अनन्य भक्ति योग से जो भी मेरी सेवा करता है, तीन गुणों से ऊपर उठकर, ब्रह्म योग्य वह बनता है. १४.२७ अजर, अनश्वर, परम ब्रह्म को पाने का साधन हूं मैं, शाश्वत धर्म व परमानन्द, सभी का पुन्य धाम हूं मैं. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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