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भागवद गीता अध्याय-१५ पुरुषोत्तम योग साप्ताहिक पाठ-४२/१५.०१ योगेश्वर ने कहा: जड़ ऊपर, शाखायें नीचे, अश्वत्थ पेड़ कहलाता, पत्ते उस के वेद, इसे जो समझे, वेदों का ग्याता. १५.०२ शाखायें सब ओर गुणों की, कलियां विषयों को कहते, जड़ फैली हैं मनुज लोक तक, जिसमें सभी कर्म होते. १५.०३ इसका असली रूप न दीखे, यह बिन आदि, अंत, आधार, द्रिढ़ जड़ का अश्वत्थ पेड़ काटो, कर अनासक्ति का वार. १५.०४ प्राप्त करो तब उस की शरण, रचा जिस ने सारा संसार, खोजो तुम वह धाम जहां से, नहीं लौटते हैं इस पार. १५.०५ जो अभिमान, मोह से छूटे, इच्छाओं को शान्त करे, लगे मुक्ति में, सुख-दुख त्यागे, परम धाम को प्राप्त करे. १५.०६ उसे न सूर्य प्रकाशित करता, चन्द्र और अग्नि भी नहीं, परम धाम है मेरा, वहां पहुंच कर, लौटे कभी नहीं. १५.०७ मेरा अंश सनातन जीवात्मा बन कर जग में रहता, प्रक्रिति में निहित इन्द्रियों तथा मन को आकर्षित करता. १५.०८ जब ईश्वर तन बनता, उसे छोड़ता, आत्मा संग जाती, जैसे वायु सुगन्धों को उन के स्थान से ले जाती. १५.०९ कान, आंख, नासिका, त्वचा, जिव्हा, मन का उपयोग करे, इन से सुख पाने के लिये, इन्द्रि विषयों का भोग करे. १५.१० मिले गुणों से, भोग करे, तन में आये, त्यागे तन को, मूर्ख न देखे लेकिन ग्यान चक्षु वाला देखे उस को. १५.११ यत्नशील योगी अपने में उसे साधना से देखे, मंद-बुद्धि, अनियन्त्रित, यत्न करे, पर उसे नहीं देखे. १५.१२ जो सारा संसार प्रकाशित करता, वह सूरज का तेज, तेज अग्नि का और चन्द्रमा का, सारे मेरे ही तेज. १५.१३ प्रिथ्वी पर प्राण शक्ति द्वारा, जन्म निरंतर लेता हूं, रस से भरा चन्द्रमा बनकर, सब को पोषित करता हूं. १५.१४ बन कर पाचक-अग्नि यहां प्राणी के तन में आता हूं, पान, अपान वायु में मिलकर, चारों अन्न पचाता हूं. १५.१५ देता ग्यान, स्म्रिति, विस्म्रिति, मैं सब के दिल में रहता हूं, मैं ही ग्यान वेद का, मैं वेदान्त, वेद का ग्याता हूं. १५.१६ नश्वर और अनश्वर दोनों रूप व्याप्त होते जग में, नश्वर से अस्तित्व, अनश्वर अंतर्यामी है सब में. १५.१७ इन से भिन्न और सर्वोत्तम, जिसको परमात्मा कहते, जो तीनों लोकों का स्वामी, जिस से सब पोषित होते. १५.१८ मैं क्षर से हूं परे, और मैं अक्षर से भी ऊपर हूं, इसी लिये जग में, वेदों के अन्दर, मैं पुरुषोत्तम हूं. १५.१९ भ्रान्ति-रहित हो, पुरुषोत्तम को जाना, सब कुछ जान लिया, पूरी तरह समझ लो, मेरी पूजा करना मान लिया. १५.२० हे अर्जुन! इस तरह बताया मैंने रहस्यपूर्ण यह ग्यान, होते सब इस से क्रितार्थ, इस से बन जाते हैं विद्वान. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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