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भागवद गीता अध्याय-१६ देवासुर सम्पदा योग साप्ताहिक पाठ-४३/१६.०१ योगेश्वर ने कहा: निर्भयता, मन की निर्मलता, विद्या-प्राप्ति, योग-रुचि, दान, आत्म-नियन्त्रण, सीधापन, तप, यग्य, शास्त्र का सच्चा ग्यान; १६.०२ सत्य, अहिंसा, क्रोध-नियन्त्रण, शान्ति, दोष से विरक्तता, दया, लोभ से मुक्ति, म्रिदुलता, लज्जा, त्याग, अचंचलता; १६.०३ द्वेष-हीनता, तेज, क्षमा, ध्रिति, पवित्रता और नम्रता; ये गुण उस के जो दैवी स्वभाव लेकर पैदा होता. १६.०४ कठोरता, पाखंड, अकड़पन, क्रोध, घमंड और अग्यान, इन को ले जो पैदा हुआ, उसे आसुरी प्रक्रिति का मान. १६.०५ बन्धन मिले आसुरी गुण से, दैवी गुण से मोक्ष मिले, अर्जुन, दुखी न हो, तू पैदा हुआ सम्पदा दैवी ले. साप्ताहिक पाठ-४४/१६.०६ दैवी और आसुरी, दो प्रकार के प्राणी होते हैं, दैवी तो सुन लिये, सुनो अब कौन आसुरी होते हैं. १६.०७ नहीं त्याग का ग्यान उन्हें, कर्मों का ग्यान नहीं होता, पवित्रता या सदाचार या सत्य, नहीं उन में होता. १६.०८ वे कहते जग असत्य, बिन स्वामी, बुनियाद नहीं कोई, जग का नियमित कारण या नैतिक आधार नहीं कोई. १६.०९ अल्प बुद्धि, भ्रष्टात्मा, कट्टर द्रिष्टिकोण यह अपनाते, बनकर शत्रु जगत के, इस का विनाश करने को आते. १६.१० अहंकार, अभिमान से भरे, पाखंडी, इच्छा रखते, मूर्ख, ग़लत द्रिष्टिकोण वाले, निश्चय बिना कर्म करते. १६.११ दबे हुये चिन्ताओं से वे, उन का अंत मौत में है, इच्छा-त्रिप्ति लक्ष्य केवल, वे समझें, सब कुछ इस में है. १६.१२ फंसे लालसा के फन्दों में, दबे वासना में रहते, भोग के लिये ही वे ढेरों सम्पति एकत्रित करते. १६.१३ मैंने सभी पा लिया, मैं सब इच्छा पूरी कर लूंगा, यह मेरा है, वह भी मेरा होगा, मैं सब कुछ लूंगा; १६.१४ इस को मार दिया है मैंने, उसको भी मारूंगा मैं, मैं ईश्वर, उपभोक्ता, सफल, सुखी, बलवान सभी कुछ मैं; १६.१५ मैं धनवान, उच्च कुल का, मैं यग्य करूंगा, दूंगा दान, मैं आनन्द मनाऊंगा - यह कहते मूर्ख और अग्यान. १६.१६ ऐसे भ्रान्त विचारों से, वे मोह जाल में फंसते हैं, करते रहते त्रप्त कामना, बुरे नर्क में गिरते हैं. १६.१७ अभिमानी, अकड़ू, धन के, मान के, नशे में रहते हैं, पाखंडी, बस दिख्लाने को, यग्य, रीति बिन करते हैं. १६.१८ द्वेष, अहम, बल, घमंड, काम, क्रोध के वश में वे रहते, मैं जो सब के अन्दर बसता, नफ़रत वे मुझ से करते. १६.१९ नीच, क्रूर, वैर से भरे वे, काम बुरे करते जाते, बार-बार, आसुरी योनि में, इसी लिये फेंके जाते. १६.२० मूर्ख, पहुंच आसुरी योनि में, जन्म कई लेकर भी वे, प्राप्त नहीं कर पाते मुझ को, गिरे हमेशा रहते वे. १६.२१ तीन तरह के द्वार नर्क के, करें नाश वो आत्मन का, काम, क्रोध, लोभ से बने हैं, त्याग करो इन तीनों का. १६.२२ तीन द्वार से अन्धकार में जाने से जो है बचता, कल्याणी कर्मों को करता, ऊंचा लक्ष्य प्राप्त करता. १६.२३ छोड़ शास्त्र नियमों को, जो अपनी इच्छा से कर्म करे, उसे न होते प्राप्त सिद्धि, सुख, न वो पुन्य-फल प्राप्त करे. १६.२४ क्या करना है, क्या नहीं करना, शास्त्रों से निर्धारित कर, शास्त्र नियम को जान, उन्हीं का नित्य जगत में पालन कर. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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