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भागवद गीता अध्याय-१७ श्रद्धात्र्य विभाग योग साप्ताहिक पाठ-४५/१७.०१ अर्जुन ने कहा: यग्य करें श्रद्धा से, बिना शास्त्र, उन की क्या गति होती? सत्व, रजस, तम गुण में करते, कैसी वह श्रद्धा होती? १७.०२ योगेश्वर ने कहा: देहधारियों की श्रद्धा, जैसा स्वभाव वैसी होती, वह सात्विक, राजसिक, तामसिक, गुण जैसा, वैसी होती. १७.०३ हर प्राणी की श्रद्धा उस के स्वभाव जैसी ही होती, स्वभाव के अनुकूल, गुणों पर आधारित श्रद्धा होती. १७.०४ सात्विक पूजें देव, राजसिक पूजें यक्ष, राक्षसों को, जो होते तामसिक, पूजते भूत, प्रेत, आत्माओं को. १७.०५ यदि करते वे उग्र तपों को, शास्त्रों द्वारा जो वर्जित, अहंकार से पूर्ण, घमंडी, काम, राग से हैं प्रेरित; १७.०६ मूर्ख, आसुरी, वे तन के तत्वों को बहुत सताते हैं, मैं जो उन के अन्दर हूं, मुझ को भी दुख पहुंचाते हैं. १७.०७ भोजन सब को प्रिय होता है, तीन तरह का उस को जान, यग्य, दान, तप तीन तरह के, सुन ले उन की भी पहचान. १७.०८ आयु, प्राण, बल, सेहत, सुख, उमंग जो भोज बढ़ाते हैं, मीठे, चिकने, रुचिकर, पोषक, वे सात्विक कहलाते हैं. १७.०९ जो तीखे, खट्टे, नमकीन, गरम, मिर्चीले, रूखे हैं, पैदा करें शोक, दुख, रोग, जलन, वो भोज राजसिक हैं. १७.१० जो भोजन बिगड़ा हो, जिस में स्वाद न हो, जो बासा हो, सड़ा हुआ, जूठा, गंदा हो, उसे तामसिक भोज कहो. १७.११ फल-इच्छा बिन करो, किन्तु विश्वास यही, कर्तव्य है यग्य, शासत्र नियम अनुकूल करो जो, कहलाता है सात्विक यग्य. १७.१२ हे अर्जुन! जो यग्य किसी फल की आशा से हैं करते, वह राजसिक यग्य है, उस को बस दिखलावे को करते. १७.१३ अन्न न बांटे, न दे दक्षिणा, नियम बिना, बिन मन्त्र करे, ऐसा यग्य तामसिक होता, बिन श्रद्धा के जिसे करे. साप्ताहिक पाठ-४६/१७.१४ देव, ब्राह्मणों, गुरुओं, विद्वानों का आदर, पवित्रता, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, यह तो शरीर का तप होता. १७.१५ शब्द कहे जो बुरा न हो, सच्चा हो, प्रिय, हितकारी हो, पाठ करे वेदों का नियमित, यह तो वाणी का तप हो. १७.१६ जिस से मौन, प्रसन्न, त्रिप्त हो, पूर्ण आत्म-संयम होता, भावों की पवित्रता जिस से, वही मानसिक तप होता. १७.१७ तीन तरह का तप करने में, अगर संतुलित मन होता, फल-इच्छा के बिना करे श्रद्धा से, सात्विक तप होता. १७.१८ जो आदर करने, पूजा के समय, दिखावे को होता, उसे राजसिक तप कहते, वह कच्चा, पल भर को होता. १७.१९ जिस तप द्वारा हठी, मूर्खता भरे लोग दुख को सहते, या औरों की हानि के लिये करें, तामसिक तप कहते. १७.२० जिसे योग्य व्यक्ति को, बिना फल-इच्छा, कर्म समझ करते, उचित जगह पर, उचित समय पर दिया दान, सात्विक कहते. १७.२१ दान, जिसे फल की इच्छा या लाभ प्राप्ति को करते हैं, जिस में होता क्लेश, उसी को दान राजसिक कहते हैं. १७.२२ ग़लत जगह या ग़लत समय पर दान अयोग्य व्यक्ति को दो, समारोह बिन, तिरस्कार से दिया दान, तामसिक कहो. १७.२३ ओम, तत, सत ये तीन शब्द, संकेत ब्रह्म का करते हैं, इन से पूजा, वेद-पाठ, यग्यों के विधान होते हैं. १७.२४ यग्य, दान, तप में सब कर्म, शास्त्र अनुकूल जिन्हें करते, शुभारम्भ उन का ब्रह्मवादी, ओम शब्द से ही करते. १७.२५ यग्य, दान, तप के उन सारे कर्मों को तत कहते हैं, जिन को, मोक्ष चाहने वाले, फल-इच्छा बिन करते हैं. १७.२६ सत का उपयोग अच्छाई, यथार्थ दर्शाने को होता, प्रशंसनीय कार्य करने को भी इस का प्रयोग होता. १७.२७ यग्य, दान, तप में द्रिढ़ हो, निश्चय करना, सत कहलाता, इसी तरह का निश्चय, अन्य कर्म में भी सत कहलाता. १७.२८ यग्य, दान, तप, कर्म, बिना श्रद्धा के किया, असत होता, लोक और परलोक कहीं भी, इस से लाभ नहीं होता. प्रस्तावना : अध्याय_०१ : अध्याय _०२ : अध्याय_०३ : अध्याय_०४ : अध्याय_०५ : अध्याय_०६ : अध्याय_०७ : अध्याय_०८ : अध्याय_०९ : अध्याय_१० : अध्याय_११ : अध्याय_१२ : अध्याय_१३ : अध्याय_१४ : अध्याय_१५ : अध्याय_१६ : अध्याय_१७ : अध्याय_१८ : साप्ताहिक_पाठ
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