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भागवद गीता

अध्याय-१८

मोक्ष सन्यास योग

साप्ताहिक पाठ-४७/१८.०१ अर्जुन ने कहा:

हे योगेश्वर! त्याग और सन्यास ग्यान की चाह मुझे;

दोनों अलग-अलग बतलाओ; क्या सच्चा? दो ग्यान मुझे.

१८.०२ योगेश्वर ने कहा:

कहते हैं, सन्यास, कामना से प्रेरित कर्मों का त्याग,

सब कर्मों के फल को तज देना भी, कहते, सच्चा त्याग.

१८.०३

कुछ कहते हैं, दोष मान कर्मों को, उन का त्याग करो,

अन्य कहें, तप, दान, यग्य के कर्मों का मत त्याग करो.

१८.०४

हे अर्जुन! अब तू मुझ से सुन, सत्य रूप में क्या है त्याग,

बुद्धिमान, विद्वान बताते, तीन तरह का होता त्याग.

१८.०५

यग्य, दान, तप के कर्मों को करो, उन का त्याग करो,

बुद्धिमान बन कर अपने जीवन को उन से शुद्ध करो.

१८.०६

निरासक्त हो कर्म करो, कर्मों के फल का त्याग करो,

हे अर्जुन! यह मेरा निश्चित मत है, इस पर ध्यान करो.

१८.०७

नित करने के योग्य कर्म का त्याग, उचित कहा जाता,

इस प्रकार का अग्यानी का त्याग, तामसिक कहलाता.

१८.०८

कष्ट और दैहिक दुख के भय से जो कर्म त्याग करता,

वह राजसिक त्याग है, उस से नहीं त्याग का फल मिलता.

१८.०९

नियमित कर्मों को जब कोई, उचित समझ, करता जाता,

अनासक्त हो त्यागे फल, वह सात्विक त्याग कहा जाता.

१८.१०

ग्यानी होता सात्विक त्यागी, फल से उसे लगाव नहीं,

घ्रिणा नहीं है अप्रिय कर्म से, प्रिय से कुछ अनुराग नहीं.

१८.११

सम्भव नहीं, देहधारी कर दे कर्मों का पूरा त्याग,

किन्तु कर्म के फल को त्यागे, वह भी तो होता है त्याग.

१८.१२

कर्मों का प्रिय, अप्रिय और मिश्रित फल म्रित्यु बाद मिलता,

जिस ने त्यागा कर्मों को, उस को कहीं भी फल मिलता.

साप्ताहिक पाठ-४८/१८.१३

हे अर्जुन! अब तू मुझ से कर्मों के उपकरणों को जान,

ये आवश्यक, पांच तरह के, सांख्य योग में इनका ग्यान.

१८.१४

कर्म-भूमि, कर्ता, उस के संग साधन सभी इन्द्रियों के,

विविध कर्म, दैवी इच्छा, ये पांच उपकरण कर्मों के.

१८.१५

जब मनुष्य अपने शरीर, वाणी, मन से कुछ भी करते,

कर्म उचित हो या अनुचित, पांचों उपकरण सदा रहते.

१८.१६

मूर्ख व्यक्ति केवल अपने को कर्मों का कर्ता माने,

उस की बुद्धि अशिक्षित होती, सच्ची बात नहीं जाने.

१८.१७

जो हो अहंकार से मुक्त, बुद्धि जिस की हो मलिन नहीं,

वह मनुष्य सब को मारे, फिर भी बंधन में पड़े नहीं.

१८.१८

ग्यान, ग्येय, ग्याता ये तीनों, कर्मों को प्रेरित करते,

कर्ण, कर्म, कर्ता ये तीनों, कर्मों का संग्रह करते.

१८.१९

ग्यान, कर्म, कर्ता के अर्थ, बताता है गुण का विग्यान,

तीन तरह के होते हैं, इन को भी ठीक तरह से जान.

१८.२०

जिससे सभी प्राणियों में देखे यथार्थता एक महान,

विभक्तता में देखे सत्ता एक, वही है सात्विक ग्यान.

१८.२१

जिस के कारण जग के प्राणी, नहीं दीखते एक समान,

दीखे अस्तित्व की विविधता, कहते उसे राजसिक ग्यान.

१८.२२

जिस से एक कार्य ही जाने, कारण का कुछ ध्यान हो,

तत्व अर्थ क्या? इसे समझे, उसे तामसिक ग्यान कहो.

१८.२३

त्याग फलों की इच्छा, नियमित कर्म जिन्हें ग्यानी करते,

राग, द्वेष से परे कर्म जो, सात्विक कर्म उन्हें कहते.

१८.२४

फल की आशा लिये, अहम के भावों से जो प्रेरित हो,

जिन में कठिन परिश्रम होता, उन्हें राजसिक कर्म कहो.

१८.२५

ग्यात हो परिणाम और पौरुष का जिस में ध्यान हो,

हिंसा, हानि हो सके जिस से, उसे तामसिक कर्म कहो.

१८.२६

सिद्धि, असिद्धि से सदा अविकल, मुक्त अहम से जो होता,

धैर्य और उत्साह से भरा, वह सात्विक कर्ता होता.

१८.२७

लोभी, हिंसक, रागी, कर्म फलों को उत्सुक जो होता,

हर्ष, शोक से विकल, अशुद्ध, राजसिक कर्ता वह होता.

१८.२८

धोखेबाज़, हठी, असभ्य, द्वेषी जो काम टालता हो,

दुखी, आलसी, असन्तुलित, उस कर्ता को तामसिक कहो.

साप्ताहिक पाठ-४९/१८.२९

हे अर्जुन! गुण पर आधारित भेद बुद्धि, ध्रिति के होते,

पूरी तरह बताता हूं, ये तीनों अलग-अलग होते.

१८.३०

कर्म, अकर्म; अभय,भयभीत; करें क्या, क्या करें, हैं क्या?

सात्विक बुद्धि समझती सब को, बंधन और मुक्ति हैं क्या?

१८.३१

जिस से क्या करना है, क्या नहीं करना, इस का ग्यान हो,

धर्म, अधर्म सही नहीं जाने, उसे राजसिक बुद्धि कहो.

१८.३२

जिस के कारण अंधकार फैले, अधर्म को धर्म कहो,

जिससे सब कुछ उलटा दीखे, उसे तामसिक बुद्धि कहो.

१८.३३

वह अविचल ध्रिति जिस से मन को, प्राणों और इन्द्रियों को,

हो एकाग्र करा ले वश में, सात्विक कहते उस ध्रिति को.

१८.३४

जिस के द्वारा धन, कर्तव्य, सुखों के संग चिपके रहते,

फल की इच्छा करते रहते, उसे राजसिक ध्रिति कहते.

१८.३५

जिस से विषाद, निद्रा, भय, अभिमान, शोक नहीं तज सकते,

सदैव मूर्ख बने रहते हैं, उसे तामसिक ध्रिति कहते.

१८.३६

गुण पर ही आधारित जानो, तीन तरह के सुख होते,

अभ्यास से इन्हें जाने जो, दूर उसी के दुख होते.

१८.३७

जो कड़वा होता पहले, पर मीठा होता है परिणाम,

आत्म-ग्यान से जो पैदा हो, सात्विक है उस सुख का नाम.

१८.३८

जो मीठा पहले, पर होता कड़वा अंत, जिसे सहते,

इन्द्रि सुखों पर जो आधारित, उसे राजसिक सुख कहते.

१८.३९

जिससे पहले और अंत में, सिर्फ़ मोह पैदा होता,

आलस, नींद, प्रमाद बढ़ाये, वही तामसिक सुख होता.

साप्ताहिक पाठ-५०/१८.४०

इस प्रिथ्वी पर और स्वर्ग में, कोई नर या देव नहीं,

प्रक्रिति से बने तीन गुणों से, जिस का जीवन बंधा नहीं.

१८.४१

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, इन सब की गतिविधियां होतीं,

गुण से नियमित स्वभाव के कारण ही अलग अलग होतीं.

१८.४२

शम, दम, तप, पवित्रता, क्षमा, सचाई, तर्कपूर्णता, ग्यान,

आस्तिकता, धार्मिकता, इन कर्मों से ब्राह्मण की पहचान.

१८.४३

तेज, धीरता, सूझ बूझ, वीरता, युद्ध में डट जाना,

ये क्षत्रिय के कर्म, करे नेत्रित्व, दान का भी कर्ना.

१८.४४

क्रिषि, पशुपालन और तिजारत, ये कर्तव्य वैश्य के हैं,

सेवा करना सब की, स्वाभाविक कर्तव्य शूद्र के हैं.

१८.४५

अपने कर्मों में लग कर ही, व्यक्ति प्राप्त करता है सिद्धि,

अर्जुन, अब समझाता हूं, किस तरह प्राप्त होती है सिद्धि.

१८.४६

व्याप्त हुआ है जो सब में, जो सब प्राणी पैदा करता

उस की पूजा कर्तव्यों द्वारा कर, सिद्धि प्राप्त करता.

१८.४७

अपना धर्म अपूर्ण, अन्य के पूर्ण धर्म से अच्छा है,

निज स्वभाव के कर्मों को करने से पाप लगता है.

१८.४८

निज स्वभाव के कर्म त्यागो, चाहे उन में दोष रहे,

जैसे आग ढकी धूंए से, दोष कर्म को ढके रहे.

१८.४९

जो है अनासक्त, अपने वश में, इच्छा भी बची नहीं,

वह सन्यासी वहां पहुंचता, जहां कर्म है शेष नहीं.

साप्ताहिक पाठ-५१/१८.५०

हे अर्जुन! अब तू सुन, सिद्धि प्राप्त कर लेने पर कैसे,

ग्यान उच्चतम ऐसा मिलता, ब्रह्म-ग्यान होता जैसे.

१८.५१

बुद्धि शुद्ध कर ले पहले वह, अपने को संयम में कर,

शब्द, अन्य विषयों का त्याग करे, वह राग, द्वेष तज कर.

१८.५२

रहे अकेला, अल्पाहारी, तन, मन, वचन संयमित हो,

सदा ध्यान में लीन, उसे वैरागी जीवन में रुचि हो.

१८.५३

अहंकार, बल, काम, क्रोध, अभिमान और सम्पति त्यागे,

शान्त चित्त हो, ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बने, ममता त्यागे.

१८.५४

होकर एकाकार ब्रह्म में, समान सब को अपनाता,

कोई शोक कोई इच्छा, उच्च भक्ति मेरी पाता.

१८.५५

मैं हूं कौन और कैसा हूं, इस का ग्यान भक्त करता,

तत्व रूप में मुझे जान कर, वो प्रवेश मुझ में करता.

१८.५६

आकर मेरी शरण भक्ति से, जो सब कर्म यहां करता,

उस पर मेरी क्रिपा निरन्तर, वह आनन्द प्राप्त करता.

१८.५७

मन से अपने तन के सब कर्मों को मुझ पर अर्पित कर,

कर अभ्यास, बुद्धि को स्थिर कर, लगा विचारों को मुझ पर.

१८.५८

बुद्धि स्थिर होगी मुझ में तो सब दुख से तर जायेगा,

नहीं सुनी यदि अहंकार में, तू विनष्ट हो जायेगा.

१८.५९

अहंकार के वश में नहीं करूंगा युद्ध कहे इस को,

ऐसा कहना व्यर्थ, करेगी विवश प्रक्रिति यह करने को.

१८.६०

हे अर्जुन! भ्रम के कारण यदि नहीं चाहता करना तू,

चाह होते भी स्वभाव से होकर विवश, करेगा तू.

१८.६१

ईश्वर सभी प्राणियों के ह्रिदयों में बस जाता है,

उन के सारे अंगों को, यन्त्रों की भांति चलाता है.

१८.६२

कर उस को अर्पित अप्ना अस्तित्व, शरण में जायेगा,

उस की क्रिपा रहेगी, जिस से सदा शान्ति, सुख पायेगा.

१८.६३

भेद भरे ये गूढ़ ग्यान, मैंने तुझ को हैं बतलाये,

कर विचार इन पर, फिर कर तू जो तेरे मन को भाये.

साप्ताहिक पाठ-५२/१८.६४

अब उन वचनों को सुन, जिन में परम रहस्य गूढ़तर है,

तू मुझ को प्रिय है, तुझ को बतलाता हूं, क्या हितकर है.

१८.६५

मन को मुझ में लगा, भक्त बन, मेरे लिये यग्य कर तू,

निश्चय ही मुझ तक पहुंचेगा, सब से अधिक मुझे प्रिय तू.

१८.६६

सब धर्मों को त्याग, अगर तू मेरी शरण चला आये,

दूर करूं तेरे सब पापों को, सब दुख से बच जाये.

१८.६७

ऐसा ग्यान उसे मत देना, जो सुने, जो भक्त हो,

मेरी निन्दा करता हो, तप की, सेवा की शक्ति हो.

१८.६८

जो मेरे इस गूढ़ ग्यान को, भक्तों को सिखलाता है,

मुझ तक पहुंचेगा अवश्य, वह भी तो भक्ति दिखाता है.

१८.६९

उस से बढ़कर भक्त कोई भी, मेरे लिये नहीं होगा,

दुनिया में उस से ज़्यादा, कोई मुझे प्यारा होगा.

१८.७०

यह पवित्र संवाद, ध्यान देकर जब कोई भी सुनता,

मैं समझूं, वह ग्यान यग्य से, मेरी ही पूजा करता.

१८.७१

जो कोई श्रद्धा से, यह संवाद, द्वेष बिन, सुना करे,

मुक्ति प्राप्त कर, परम पुन्य के दिव्य लोक को प्राप्त करे.

१८.७२

हे अर्जुन! जो कहा, उसे है सुना ध्यान से, क्या तूने?

अपना भ्रम, अग्यान से भरा, मिटा दिया है, क्या तूने?

१८.७३ अर्जुन ने कहा:

हे योगेश्वर! नष्ट हुआ भ्रम, याद लौट आई मेरी,

दूर हुआ संदेह, स्थिर हूं, आग्या मानूंगा तेरी.

१८.७४ संजय ने कहा:

मैंने सुना क्रिष्ण, अर्जुन का यह संवाद ध्यान देकर,

मेरे सभी रोंगटे खड़े हो गये हैं, इस को सुन कर.

१८.७५

यह तो क्रिपा व्यास की, जिस से इतना गहरा ग्यान सुना,

योगेश्वर के द्वारा ही यह दिया गया उपदेश सुना.

१८.७६

यह संवाद क्रिष्ण, अर्जुन का, याद मुझे जब आया है,

पुलकित होकर तब मैंने आनन्द बहुत ही पाया है.

१८.७७

योगेश्वर का अद्भुत रूप, याद जब भी मुझ को आता,

होता है आश्चर्य मुझे, मन मेरा हर्षित हो जाता.

१८.७८

जहां क्रिष्ण योगेश्वर और धनुर्धारी अर्जुन होंगे,

वहां नीति, कल्याण, विजय, श्री, अवश्य ही रहते होंगे.

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